Friday, June 30, 2017

हमारे बाद भी रहे हमारे कर्मों की याद

"कहा जाता है कि ज़िन्दगी के "कुछ लम्हों" को "यादगार" बनाना तो सभी चाहते हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग अक्सर यही सोचकर "निराश" हो जाते हैं कि ऐसा कोई "बड़ा काम" करना उनके बस की बात नहीं, और वे अपनी ज़िन्दगी के लम्हों को यादगार नहीं बना पाते, और "गुमनामी" के "अंधेरों" में ही जीवन "गुज़ार" देते हैं।
"दरअसल, हमारे दुनिया से जाने के बाद हमारी यादगार कैसी हो, इसे लेकर लोग अक़्सर "ग़फ़लत" में ही रहते हैं, यह तो "मुमकिन" नहीं कि सभी लोग "ऐतिहासिक शख़्सियत" बनने की "क्षमता" या "कुव्वत" रखते हों, फिर ऐसा क्या किया जाये जिससे हमारे जाने के बाद भी हमारे द्वारा किये गए कामों की "याद" बाक़ी रहे ?
"असल में, ज़िन्दगी में किसी ने "बड़ा काम" किया या "छोटा", इसकी कोई "अहमियत" नहीं होती, अहमियत इस बात की होती है कि आपने अपने "हाथों" से अपनी "आत्मा" की आवाज़ पर कुछ ऐसा काम किया जो पहले नहीं था, यह सचमुच "सोचने वाली" बात है कि जो बरसों पहले हमारे आस-पास "पीपल, "बरगद, जैसे पेड़ लगा गये क्या उनका "योगदान" अखबारों की "सुर्खियों" में रहने वालों से कम है ? कुछ करके दिखाने का मतलब यह नही कि हमे "पद-प्रतिष्ठा", और "पैसे" कमाने पर खरा माना जाये, बल्कि कुछ करके दिखाने का "असल मतलब" यह है कि हमारा किया हुआ कोई काम "दिल" को "छूता" हो, और हमारे जाने के "बाद" भी लोगों के दिलों को "छूता" रहे। अक़्सर लोग अपने "छोटे-छोटे कामों" के द्वारा भी लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं, और हमेशा बनाये रहते हैं।
"तो दोस्तों, अपने जीवन में "छोटे-बड़े" की परवाह किये बग़ैर कुछ ना कुछ ऐसे काम करें, जिनसे आपके इस "दुनिया" से जाने के "बाद" भी आपके द्वारा किये गए कामों की वजह से आप लोगों के "दिलों" में "ज़िन्दा" रहें। क्योंकि यही जीवन है, और यही इन्सानियत है।  (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

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