Sunday, February 26, 2017

ज़िन्दगी का दूसरा नाम है आशा


"कहा जाता है कि जीवन का दूसरा नाम "आशा" यानि "उम्मीद" है, जहाँ "ज़िन्दगी" है वहाँ "आशा" है, और जहाँ आशा(उम्मीद) नहीं, वहाँ "जीवन" का कोई "मतलब" ही नहीं। "दरअसल, हमारे जीवन की मूल "बुनियाद" यही आशा(उम्मीद) है इसी के सहारे हम अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में "तीन चीज़ों" की "आशा" ज़रूर लगाये रखता है- 1.प्रियतम का सहचर्य (महबूब का साथ) 2. अतुल संपत्ति(बेशुमार दौलत) 3. अमरता(कभी ना मरना), चाहें ज़िन्दगी में हमें ये चीज़ें मिलें या ना मिलें, लेकिन ज़िन्दगी के "मायने" यही हैं कि इनकी और इनके जैसी अन्य चीजों की आशा या उम्मीद हमेशा हर इंसान रखता है। 
"असल में, उम्मीद की "अहमियत" कभी कम नहीं होती, और ख़ुद से उम्मीद रखना, और दूसरों की उम्मीदों पर "खरा" उतरना जीवन का "लक्ष्य" होना चाहिए। और अगर उम्मीदों से परे हटकर हम अपनी ज़िन्दगी "न्यूट्रल गियर" में गुज़ार रहे हैं, तो  यह तय है कि हम अपनी ज़िन्दगी "चलताऊ" तरीके से गुज़ार रहे हैं। दरअसल आशा पैदा होती है "विश्वास" से, जिस चीज़ का हमें विश्वास(भरोसा) होता है, उसकी हम "आशा" भी करते हैं। और "सच्चे मन" से कार्य करने पर वह चीज़ हमें मिल भी जाती है।
"तो दोस्तों, *जब तक सांस है तब तक आस है* इसलिए हमें आशा या उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, ज़िन्दगी के "कठिन रास्तों" पर "मुश्किलों" की वजह से "निराशाओं" से भी हमारा "सामना" होता है, लेकिन उनसे हारकर बैठना ठीक नहीं, बल्कि "सकारात्मक सोच" और आशा के साथ "सच्चे मन" और "लगन" से कार्य करने से जीवन में सारी उम्मीदें ना सही लेकिन कुछ उम्मीदें ज़रूर पूरी होंगी।।
        (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

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