Thursday, February 16, 2017

वक़्त से शिक़ायत



"आज के दौर में अक़्सर लोग "वक़्त" की "बुराई" करते मिल जाते हैं, अक्सर इंसान ये सोचता हैं कि "वक़्त" का उससे जैसे "छत्तीस का आंकड़ा" है, "बहुत बुरा समय है" को "तकिया कलाम" बनाकर, उसे दोहराते रहना आज के इंसान की "आदत बन चुकी है। और ये एक ऐसी आदत है जो ज़िन्दगी के "मज़े" हमसे "छीनती" है। 
"दरअसल, वर्तमान(Present time) को लेकर नकारात्मक सोच(Negative thinking) हर दौर की "सच्चाई" रही है। जितनी "परेशानियां, जितना "भ्रष्टाचार, जितना "अनादर, जितना "दुराचार, जितना "असत्य और "झूठ, आज के दौर में है, उतना ही कमोबेश पहले के ज़माने में भी था, ये अलग बात है कि उसके प्रकार (Category) अलग थी। और जितनी "ईमानदारी, जितनी "सत्यता, जितनी "मानवता, और "नेक-नियती, पहले थी, कमोबेश आज भी उतनी ही है, ये अलग बात है कि ये सब "अच्छाइयाँ" लोगों तक कम पहुँचती हैं, बल्कि "बुराइयाँ" ही ज़्यादा पहुँचती है।
"असल में, पहले का ज़माना हो या आज का दौर, मौजूदा वक़्त की एक राह, "बर्बादी" की ओर जाती है, और एक राह "नवनिर्माण" यानि "तरक़्क़ी" की ओर जाती है। हमारी जो "शिकायतें" वक़्त से होती हैं, उन्हें दूर करने के लिये ख़ुद ही आगे आना चाहिए, माँ के पेट से बाहर आते समय हमारी "बंद मुट्ठी" में जो कुछ होता है, उसे अपने "बूते" से हम जितना "विकसित" कर सकते हैं या बढ़ा सकते हैं उसी से हमारा वक़्त और ये दुनिया "खूबसूरत" होती है। हमें अपना वक़्त सुधारने, और अच्छा करने के लियें, आंतरिक तौर(अन्दर से) "जागना" होगा, क्योंकि किसी अन्डे का खोल अगर बाहरी "प्रहार(चोट) से टूटता है, तो "जीवन का अंत" हो जाता है, और उसी अन्डे का खोल अगर अपने-आप आंतरिक शक्ति(अंदर की ताक़त) से "टूटता" है तो एक जीवन की "शुरुआत" होती है। इसी तरह वक़्त को लेकर हमारी "शिकायतें" दूर करने की "ताक़त" भी हमारे अन्दर ही है।
"इसलियें दोस्तों, हमें और आपको चाहिए कि "वक़्त बुरा चल रहा है" का जुमला कह-कहकर हाथ पर हाथ धरे ही ना बैठे रहें, बल्कि अपने अन्दर की "ताक़त" के बल पर बुरे वक़्त की "वजहों" को तलाश करने की कोशिश करें, और वक़्त की "बुराइयों" को "अच्छाइयों" में बदलने की कोशिश करते रहें, और इंशाअल्लाह एक ना एक दिन वक़्त अच्छा ज़रूर होगा।
              (शुक्रिया)
            .........................
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

0 comments:

Post a Comment