Monday, February 6, 2017

बन जाये अलग पहचान, तेरी इन इन्सानों में



"इक "अजीब" सी "धुन" बजा रखी है,
"जिंदगी" ने मेरे "कानों" में,
"मिलता है कहाँ "चैन",
"पत्थर" के इन "मकानों" में,

"करते हैं कोशिश बहुत, "वजूद" अपना बनाने को,
"हो जाते हैं मगर "अपनों से दूर,
"नज़र आते है "बेगानों" में,

"रहती नहीं "हंस्ती", दुनिया में "हमेशा" किसी की,
"आखिर में जगह मिलती है,
सबको कहीं दूर "शमशानों" में,

"ना कर "ग़म" ऐं नादां, कि कोई नहीं तेरा,
"ख़ुश" रहने की राह है, "मस्ती" के "तरानों" में,

"देता नहीं कोई किसी का "साथ" इस दुनिया में,
"होता नहीं कोई "दम", लोगों के "अफसानों" में,

"क्यों रहता है "निराश", अपनी ही कमज़ोरी से,
"झोंक दे "ताक़त" अपनी,
करने को "फतह" ज़िन्दगी के मैदानों में,

"कर दे "ख़ुदा" के हवाले, ख़ुद को ऐं "इंसान",
"कि होता है "असर" बहुत, "आरती" और "आज़ानों" में,

"करनी है "बसर" ज़िन्दगी तो,
किसी की "भलाई" में कर,
"वर्ना क्या "फ़र्क" है, "तुझमें" और "शैतानों" में,

"कुछ करके, पेश कर "इन्सानियत की मिसाल",
"बन जाए अलग "पहचान", तेरी इन "इंसानों" में,

"बन जाए अलग "पहचान", तेरी इन "इंसानों" में........
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)

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