Sunday, February 26, 2017

बड़ी सोच रखें बड़ा ही होगा


"कहा जाता है कि जो इंसान "बड़ा" सोचता है वही एक दिन "बड़ा" करके भी दिखाता है। और जिसके सोचने की "शक्ति" बेहद "संकुचित(छोटी)" होती है, वह व्यक्ति कभी कुछ बड़ा या अच्छा नहीं कर पाता है।
"दरअसल, अक्सर हम इंसान अपने जीवन में बड़े या छोटे होने की बात करते हैं, और इंसान का बड़ा या छोटा होना अक्सर हम उसके "पैसे", "शोहरत", या "रुतबे", के हिसाब से तय करते हैं। लेकिन इंसान का बड़ा या छोटा होना ये सब चीज़ें तय नहीं करती हैं, "असल में, इंसान की "सोच" और उसके "कर्म" ही उसे "बड़ा" या "महान" बनाते हैं। हमें हमेशा अपनी "सोच बड़ी" और "अच्छी" ही रखनी चाहिए, क्योंकि अगर हम बड़ा सोचेंगे ही नहीं तो बड़ा काम कर कैसे पाएंगे ? अगर हम अपने "दिल" और "दिमाग" में "दरिद्रता", "गरीबी", को ही जगह दिए रहेंगे, तो हम कभी "धनी" नहीं बन सकते। और इसके उलट अगर हम "सकारात्मक सोच" के साथ "आशान्वित" रहेंगे कि एक दिन हम भी "धनी" होंगे, तो अवश्य ही हम धनी होंगे।
"असल में, इंसान की "कामयाबी, "नाकामयाबी, का सारा "दारोमदार", उसकी "सोच" और "नियत" पर निर्भर करता है। क्योंकि व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है, हम जैसा "बनना चाहते हैं, वैसा बार-बार सोचें तो एक दिन अवश्य हम वैसे ही बन जायेंगे। कामयाबी की "ऊँचाइयाँ" हमारी "सोच" से ही निकलती हैं। इंसान में सोच की ऐसी "जादुई ताक़त" है, कि अगर वह इस सोच का "उचित प्रयोग" करे, तो कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है। 
"इसलियें दोस्तों, हमें और आपको चाहिए कि हमेशा बड़ा सोचें, बड़ा सोचने से बड़ी उपलब्धियां, और कामयाबियां, हासिल होंगी, फायदे भी बड़े होंगे, और देखते ही देखते हम अपनी "बड़ी सोच" के द्वारा "बड़े आदमी" भी बन जायेंगे।
               (धन्यवाद)
~~~~~~~~~~~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"



मेहनत और आत्मविश्वास का जादू


'कहा जाता है कि इंसान के अन्दर "मेहनत" करने का गुण, और "ख़ुद पर यक़ीन" यानि "आत्मविश्वास", हो, तो एक ना एक दिन "जादू की तरह इसका "फल" मिलता है। हमें पता भी नहीं चलता, और हम "सफलता की "ऊँचाइयों को छूने लगते हैं।
"दरअसल, हम सब अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी का ऊँचे से ऊँचा "पहाड़" तो छूना चाहते हैं, हर पल एक "नया इतिहास" रचना चाहते हैं, हर क़दम पर "कुछ" कर गुज़रना चाहते हैं। लेकिन ये सब करने के लियें ना तो हम पूरे तौर पर मेहनत करते हैं, और ना ही हमें अपने ऊपर "यक़ीन" होता है कि हम यह सब कर पाएंगे, नतीजा ये होता है कि कामयाबी पाने के रास्ते पर चलते हुए जब "मुश्क़िल" या "विपरीत" "परिस्थितयां" आती हैं तब हम "पूरी शिद्दत" के साथ मेहनत नहीं कर पाते, और हमारा "आत्मविश्वास भी "डगमगाने" लगता है, और हम "परेशानियों की "धधकती आग" की "तपिश" से घबराकर "वापस" लौट जाते हैं।
"असल में, ज़िन्दगी में "कुछ" हासिल करने के लियें, मेहनत के "कड़े" और "लंबे रास्ते" से गुज़रना ही होता है, और साथ ही ख़ुद पर यक़ीन भी बनाये रखना होता है। हर "शिखर" पर हमेशा "खाली जगह" भी होती है, अगर इंसान मेहनती हो तो किसी भी "ऊँचाई" को पाने में सफलता हासिल की जा सकती है। दरसअल, मेहनत और आत्मविश्वास का चोली-दामन का साथ होता है, जब हम मेहनत करते हैं तो हमारे अन्दर आत्मविश्वास आता है, तब हम उस आत्मविश्वास के बल पर और ज़्यादा मेहनत करते हैं। मेहनत और आत्मविश्वास साथ-साथ चलते हैं, लेकिन अगर आत्मविश्वास में कमी आ जाये तो हम कठोर मेहनत के बाद भी "ऐन मौके पर" पर बाज़ी "हार" जाते हैं।
"तो दोस्तों, ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करने के लियें मेहनत, और आत्मविश्वास यानि ख़ुद पर भरोसा, दोनों ही चीज़ें बहुत "ज़रूरी" होती हैं, और अगर हम इन दोनों ही चीज़ों को कर पाये, तो "निःसन्देह" हमें "मेहनत" और "आत्मविश्वास" का "जादू" देखने को ज़रूर मिलेगा, और हम कामयाब हो जायेंगे।।
             (शुक्रिया) 
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

ज़िन्दगी का दूसरा नाम है आशा


"कहा जाता है कि जीवन का दूसरा नाम "आशा" यानि "उम्मीद" है, जहाँ "ज़िन्दगी" है वहाँ "आशा" है, और जहाँ आशा(उम्मीद) नहीं, वहाँ "जीवन" का कोई "मतलब" ही नहीं। "दरअसल, हमारे जीवन की मूल "बुनियाद" यही आशा(उम्मीद) है इसी के सहारे हम अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में "तीन चीज़ों" की "आशा" ज़रूर लगाये रखता है- 1.प्रियतम का सहचर्य (महबूब का साथ) 2. अतुल संपत्ति(बेशुमार दौलत) 3. अमरता(कभी ना मरना), चाहें ज़िन्दगी में हमें ये चीज़ें मिलें या ना मिलें, लेकिन ज़िन्दगी के "मायने" यही हैं कि इनकी और इनके जैसी अन्य चीजों की आशा या उम्मीद हमेशा हर इंसान रखता है। 
"असल में, उम्मीद की "अहमियत" कभी कम नहीं होती, और ख़ुद से उम्मीद रखना, और दूसरों की उम्मीदों पर "खरा" उतरना जीवन का "लक्ष्य" होना चाहिए। और अगर उम्मीदों से परे हटकर हम अपनी ज़िन्दगी "न्यूट्रल गियर" में गुज़ार रहे हैं, तो  यह तय है कि हम अपनी ज़िन्दगी "चलताऊ" तरीके से गुज़ार रहे हैं। दरअसल आशा पैदा होती है "विश्वास" से, जिस चीज़ का हमें विश्वास(भरोसा) होता है, उसकी हम "आशा" भी करते हैं। और "सच्चे मन" से कार्य करने पर वह चीज़ हमें मिल भी जाती है।
"तो दोस्तों, *जब तक सांस है तब तक आस है* इसलिए हमें आशा या उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, ज़िन्दगी के "कठिन रास्तों" पर "मुश्किलों" की वजह से "निराशाओं" से भी हमारा "सामना" होता है, लेकिन उनसे हारकर बैठना ठीक नहीं, बल्कि "सकारात्मक सोच" और आशा के साथ "सच्चे मन" और "लगन" से कार्य करने से जीवन में सारी उम्मीदें ना सही लेकिन कुछ उम्मीदें ज़रूर पूरी होंगी।।
        (शुक्रिया)
~~~~~~~~~~~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

जीवन एक रंगमंच है


"कहा जाता है कि हमारा जीवन एक "रंगमंच"(नाच, नाटक, खेल, करने की जगह) है। और हम सब इंसान इस "रंगमंच" पर "नाटक" करने वाले "कलाकार और "अभिनेता हैं। और इस रंगमंच को चलाने वाला, यानि इसका "डाइरेक्टर" वो ऊपर बैठा "हमारा ख़ुदा", "हमारा ईश्वर" है।
"दरअसल, हमारी ज़िन्दगी रंगमंच पर चलता हुआ एक "नाटक" ही तो है, हमें इस रंगमंच पर या इस दुनिया के नाटक में अभिनय(Acting) करने के लिये ही तो भेजा गया है। इसी अभिनय के तहत हम अपनी ज़िन्दगी में "रोते" भी हैं, "हँसते" भी हैं, "दुःखी" भी होते हैं, "खुश" भी होते हैं, "प्यार" भी करते हैं, "नफ़रत" भी करते हैं, किसी को "मारते" भी हैं, ख़ुद "मरते" भी हैं, "ख़लनायक" बनकर लोगों पर "ज़ुल्म" भी करते हैं, और "नायक" यानि "हीरो" बनकर लोगों की "मदद" भी करते हैं।। 
"असल में, "ख़ुदा ने हम सबको इस दुनिया के "रंगमंच" पर अपने "अभिनय" या Acting की बेहतर से बेहतर "Performence" देने के लिये भेजा है, और एक दिन आख़िर में जब इस जीवन के नाटक का "अंत" होगा तब हमारे अभिनय की Performence का "रिजल्ट" हमें पता चलेगा, कि हमें "जिस अभिनय" के लिये भेजा गया था वो हमने "कैसा" किया, क्योंकि उस ख़ुदा ने तो जीवन के इस रंगमंच पर भेजने के साथ-साथ इसमें अभिनय करने के लिये "स्क्रिप्ट"(क़ुरान, गीता, बाइबल, गुरुग्रंथ) भी "लिखकर" भेजी है। और इस "स्क्रिप्ट" में साफ़-साफ़ ये बता दिया है कि हमें ज़िन्दगी के इस रंगमंच पर "किस तरह अभिनय करना है, अब ये हमारे ऊपर है कि हम जीवन के इस रंगमंच के मंच पर ख़ुदा की भेजी हुई "स्क्रिप्ट" के "मुताबिक" अभिनय करते हैं या "अपनी मर्ज़ी" से "अलग-थलग" होकर अपने "डायलॉग" बोलते हैं। लेकिन कुछ भी करें एक दिन हमें अपने अभिनय की इस Performence का हिसाब अपने Director उस ख़ुदा को ज़रूर देना होगा, और हमारी Performence के हिसाब से ही वो हमें हमारा ईनाम देगा।। (बस दोस्तों इतना ज़रूर याद रखें)          (शुक्रिया)
~~~~~~~~~~~~~~~
*लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद*
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

ये है भारत की "गंगा-जमुनी" "तहज़ीब" और असली "इन्सानियत



"दोस्तों, "नफ़रतों" के "बादल" चाहें कितना भी "घुमड़-घुमड़" कर आयें, लेकिन जब "बरसते" हैं तो "इन्सानियत की बारिश" बनकर ही "बरसते" हैं।
जी हाँ, मामला कांठ थाना क्षेत्र के गाँव "अकबरपुर चंदेरी" का है इस गांव में एक "एसआई" ने भारत की "गंगा-जमुनी तहज़ीब" की बेहद "ख़ास" "मिसाल" पेश की है। दरअसल, इस गांव में एक मंदिर है, जहाँ शिवरात्रि के मद्देनज़र लोगों की भारी भीड़ पहुंचती है। इस मंदिर तक जाने वाले रास्ते का निर्माण कार्य चल रहा है अभी भी ये पूरी तरह बना नहीं है, और कई जगह से टूटा हुआ है।

शिवरात्रि के मद्देनजर गांव के लोग मंदिर जाएंगे और जलाभिषेक करेंगे, लेकिन मंदिर का रास्ता खराब होने से उन्हें परेशानी आएगी। मंदिर में आने वाले भक्तों को परेशानी ना हो इसलिए कांठ थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर "हारून ख़ान" ने ख़ुद ही "फावड़ा" उठाकर "मोर्चा" संभालते हुए रास्ते को सही करने की "कवायद" शुरू कर दी। सब इन्स्पेक्टर हारून ख़ान को फावड़ा चलाता देख आस-पास के लोग और दूसरे ग्रामीण हैरत में पड़ गए, उनके लिए पुलिस का यह "रूप" "चौंकाने" वाला था। सब- इन्स्पेक्टर को फावड़ा चलाते देख दूसरे लोग भी उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर सड़क सुधार के कार्य में हाथ बंटाने लगे। पूरे रास्ते के गड्ढों को मिट्टी डाल कर टेल्स लगा कर सही किया गया। ज्ञात हो कि ये वही गाँव है जहाँ लाउडस्पीकर को लेकर पूर्व में "विवाद" हो चुका है, और उसी विवाद को "कंट्रोल" करने में उस समय के मुरादाबाद जिलाधिकारी की आँख में "गंभीर चोट" आयी थी, और उन्हें चिकित्सा के लियें चेन्नई भेजना पड़ा था।

"दोस्तों, सब-इन्सपेक्टर "हारून ख़ान" का ये कार्य दोनों ही रूप में "सराहनीय" है, एक तो वे अपनी "डयूटी" के प्रति "बेहद गंभीर, और "सतर्क हैं, दूसरे वो एक "मुस्लिम" हैं, और इस तरह से "मन्दिर" के रास्ते को अपने हाथों से "श्रमदान" देकर उन्होंने "इन्सानियत" की जो "मिसाल" पेश की है। वो "प्रशंसा" के क़ाबिल है।

"और हमारी हमेशा यही "कोशिश" रहती है कि समाज में कहीं भी कोई भी "अच्छा", और "इन्सानियत को ज़िन्दा" रखने वाला "काम" कर रहा है तो उसको हम अपनी "लेखनी" के द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं, जिससे कि दूसरे भी उससे "प्रेरणा" ले सकें, और "इन्सानियत की मिसाल" क़ायम कर सकें। (धन्यवाद)

~~~~~~~~~~~~~~~

(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)

संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*



मुरादाबाद: एसआई हारुन खान ने पेश की मिसाल, मंदिर जाने वाले रास्ते को ठीक करने के लिए उठाया फावड़ा

http://dhunt.in/20gc6?ss=wsp

via Dailyhun

Wednesday, February 22, 2017

जीवन की "कठिनाइयाँ" और इंसान की "बौखलाहट



"कहा जाता है कि ज़िन्दगी में अक्सर हम इन्सानों के सामने जब कोई "कठिनाई" या "परेशानी" आती है, तो ऐसी स्थिति में हम "बौखला" जाते हैं, और बिना सोचे-समझे कोई "ग़लत फैसला" कर बैठते हैं, जिससे हमें बजाय "फायदे" के "नुकसान" ही होता है।
"दरअसल, यह बात सही है कि हमारे जीवन में "लाखों कठिनाइयाँ" हैं, मगर इन कठिनाइयों से निकलने के "रास्ते" और "उपाय" भी कम नहीं। लेकिन ज़िन्दगी में जब कोई कठिनाई हमारे सामने आती है तो हम बौखला जाते हैं, और यही "बौखलाहट" हमारी "सोचने-समझने" की "ताक़त" को कम कर देती है, और ऐसे में हम कोई गलत फैसला ले बैठते हैं। जबकि ऐसी किसी भी "परिस्थिति" में होना यह चाहिए कि हम अपने दिमाग को "शांत" रखने की कोशिश करें, कठिनाई से "घबरायें" या "भागें" नहीं, और उन हालात के आगे "लड़खड़ाने की बजाय, धैर्य, सुकून, और "सहजता के साथ उस कठिनाई से "बाहर" निकलने का "रास्ता" तलाश करें।
"असल में, कठिनाई जितनी भी बड़ी हो, उसके आगे "मौन साधना" सीखें, बिना "हड़बड़ाये शांत होकर दिल और दिमाग को ठंडा करने से ही "आधी लड़ाई" उस कठिनाई से हम जीत सकते हैं। क्योंकि अगर हमारा "मन" और "मस्तिष्क" "शांत" और "स्थिर" नहीं होता, तो किसी भी कठिनाई की स्थिति में समस्या बजाय कम होने के "बढ़ती" ही है। अगर हमें बुरे हालात से सामना करना है तो "भावनात्मक रूप" से मज़बूत रहना होगा, और शांत रहकर "बुरे हालात" से छुटकारा पाना होगा।
"तो दोस्तों, हम सभी की ज़िन्दगी में "परेशानियां, "कठिनाइयां, "समस्याएं, तो आती ही हैं, लेकिन ऐसी "परिस्थिति" में हमें और आपको चाहिए कि बिना "घबराये, बिना "बौखलाये, "शांत मन" से अपनी परेशानी की वजहों, और उससे बाहर निकलने का "रास्ता" तलाश करें, और यक़ीन रखें ऐसा करने से बड़ी से बड़ी कठिनाई भी आसान हो जाती है (धन्यवाद)
~~~~~~~~~~~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*

चेहरे की सुंदरता अच्छी, या मन की सुंदरता अच्छी



"कहा जाता है कि अगर हमारी "आँखें" चेहरे की जगह "आत्मा या मन की "सुंदरता" देख पातीं, तो ये दुनिया कुछ अलग होती। हमारे "रिश्ते" और "व्यवहार" सभी अलग होते, और सुंदरता की "परिभाषा(Definition) भी अलग होती।
"दरअसल, आज हमारे समाज में हर दिन "युवा लड़के" और ख़ास तौर पर "लड़कियाँ" सुंदरता के प्रति किये जाने वाले इस "भेदभाव" के शिकार होते हैं। अक्सर हम दूसरों के द्वारा अपने बहुत पतले, बहुत मोटे, दूसरों से लंबे, या बहुत ठिगने, या फिर काला या गोरा होने के "तानों" का शिकार होते हैं। दूसरों के द्वारा किये गये "तानाकशी" या Comments से कई तरह की "हीनभावनाएं" हमारे दिल में बैठ जाती हैं, जो हमारा पीछा नहीं छोड़तीं, और हम अपने आपको दूसरों से "तुच्छ" समझने लगते हैं, और ना चाहते हुए भी हम कई तरह के "दबाव" "झेलते" रहते हैं।
"असल में, हम समाज के द्वारा की गयी सुंदरता की परिभाषा को नहीं बदल सकते, लेकिन अपनी सोच, और अपने लियें सुंदरता की परिभाषा को अवश्य बदल सकते हैं। हम सुन्दर होने के लियें इसलियें बेचैन रहते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि हम सुन्दर नहीं हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं, हमें सोचना यह चाहिए कि ईश्वर का बनाया हुआ हर व्यक्ति सुन्दर होता है, हर कोई अपने अन्दर कोई ना कोई "ख़ूबसूरती" लिए हुए होता है। किसी का "चेहरा सुन्दर होता है, किसी की "आवाज़ सुन्दर होती है, किसी का "व्यवहार सुन्दर होता है, किसी की "आँखें सुन्दर होती हैं, किसी के "बाल सुन्दर होते हैं, किसी की "नाक सुन्दर होती है, और कोई "गोरा होकर भी सुन्दर नहीं होता, तो कोई "काला" होकर भी बेहद "सुन्दर और "आकर्षित" लगता है।
"दरअसल, सुंदरता ईश्वर ने नहीं समाज ने तय की है, हमारे जीवन के लियें हमारा ये शरीर एक "सच" है, और हम इसे सबसे सुंदर मानकर प्यार करें, चेहरे के साथ-साथ विचारों की सुंदरता भी बेहद अहम् है, लोग चेहरे से "आकर्षित" तो होते हैं, लेकिन "प्यार" आपके "व्यवहार और "गुणों से करते हैं, इसलियें अपने चेहरे या शरीर के लिये ख़ुद को "कोसना" बंद करें, आप कैसे दिखते हैं, इसकी जगह आप क्या हैं, कहाँ "मज़बूत" हैं, और कौन सी "ख़ूबी" आपके अंदर है, इस रूप में ख़ुद की सुंदरता को परिभाषित करें।।
"तो दोस्तों, हमें और आपको चाहिये,(ख़ास तौर पर युवा लड़कियों को) कि अपने चेहरे, अपने शरीर, या अपने रंग को लेकर किसी भी तरह की हीन-भावना का शिकार ना हों, आप जैसे भी हैं बेहद सुन्दर हैं, और अपने अंदर मोटे, पतले, लंबे, ठिगने, या काला, या गोरा, होने का "ऐब" निकालने की बजाय, अपने "व्यवहार और "गुणों" को दूसरों के सामने लायें, और अपनी "आत्मा" और "मन" की "सुंदरता से सबका मन मोह लें।
(धन्यवाद)
~~~~~~~~~~~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*

Thursday, February 16, 2017

वक़्त से शिक़ायत



"आज के दौर में अक़्सर लोग "वक़्त" की "बुराई" करते मिल जाते हैं, अक्सर इंसान ये सोचता हैं कि "वक़्त" का उससे जैसे "छत्तीस का आंकड़ा" है, "बहुत बुरा समय है" को "तकिया कलाम" बनाकर, उसे दोहराते रहना आज के इंसान की "आदत बन चुकी है। और ये एक ऐसी आदत है जो ज़िन्दगी के "मज़े" हमसे "छीनती" है। 
"दरअसल, वर्तमान(Present time) को लेकर नकारात्मक सोच(Negative thinking) हर दौर की "सच्चाई" रही है। जितनी "परेशानियां, जितना "भ्रष्टाचार, जितना "अनादर, जितना "दुराचार, जितना "असत्य और "झूठ, आज के दौर में है, उतना ही कमोबेश पहले के ज़माने में भी था, ये अलग बात है कि उसके प्रकार (Category) अलग थी। और जितनी "ईमानदारी, जितनी "सत्यता, जितनी "मानवता, और "नेक-नियती, पहले थी, कमोबेश आज भी उतनी ही है, ये अलग बात है कि ये सब "अच्छाइयाँ" लोगों तक कम पहुँचती हैं, बल्कि "बुराइयाँ" ही ज़्यादा पहुँचती है।
"असल में, पहले का ज़माना हो या आज का दौर, मौजूदा वक़्त की एक राह, "बर्बादी" की ओर जाती है, और एक राह "नवनिर्माण" यानि "तरक़्क़ी" की ओर जाती है। हमारी जो "शिकायतें" वक़्त से होती हैं, उन्हें दूर करने के लिये ख़ुद ही आगे आना चाहिए, माँ के पेट से बाहर आते समय हमारी "बंद मुट्ठी" में जो कुछ होता है, उसे अपने "बूते" से हम जितना "विकसित" कर सकते हैं या बढ़ा सकते हैं उसी से हमारा वक़्त और ये दुनिया "खूबसूरत" होती है। हमें अपना वक़्त सुधारने, और अच्छा करने के लियें, आंतरिक तौर(अन्दर से) "जागना" होगा, क्योंकि किसी अन्डे का खोल अगर बाहरी "प्रहार(चोट) से टूटता है, तो "जीवन का अंत" हो जाता है, और उसी अन्डे का खोल अगर अपने-आप आंतरिक शक्ति(अंदर की ताक़त) से "टूटता" है तो एक जीवन की "शुरुआत" होती है। इसी तरह वक़्त को लेकर हमारी "शिकायतें" दूर करने की "ताक़त" भी हमारे अन्दर ही है।
"इसलियें दोस्तों, हमें और आपको चाहिए कि "वक़्त बुरा चल रहा है" का जुमला कह-कहकर हाथ पर हाथ धरे ही ना बैठे रहें, बल्कि अपने अन्दर की "ताक़त" के बल पर बुरे वक़्त की "वजहों" को तलाश करने की कोशिश करें, और वक़्त की "बुराइयों" को "अच्छाइयों" में बदलने की कोशिश करते रहें, और इंशाअल्लाह एक ना एक दिन वक़्त अच्छा ज़रूर होगा।
              (शुक्रिया)
            .........................
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

Monday, February 6, 2017

बन जाये अलग पहचान, तेरी इन इन्सानों में



"इक "अजीब" सी "धुन" बजा रखी है,
"जिंदगी" ने मेरे "कानों" में,
"मिलता है कहाँ "चैन",
"पत्थर" के इन "मकानों" में,

"करते हैं कोशिश बहुत, "वजूद" अपना बनाने को,
"हो जाते हैं मगर "अपनों से दूर,
"नज़र आते है "बेगानों" में,

"रहती नहीं "हंस्ती", दुनिया में "हमेशा" किसी की,
"आखिर में जगह मिलती है,
सबको कहीं दूर "शमशानों" में,

"ना कर "ग़म" ऐं नादां, कि कोई नहीं तेरा,
"ख़ुश" रहने की राह है, "मस्ती" के "तरानों" में,

"देता नहीं कोई किसी का "साथ" इस दुनिया में,
"होता नहीं कोई "दम", लोगों के "अफसानों" में,

"क्यों रहता है "निराश", अपनी ही कमज़ोरी से,
"झोंक दे "ताक़त" अपनी,
करने को "फतह" ज़िन्दगी के मैदानों में,

"कर दे "ख़ुदा" के हवाले, ख़ुद को ऐं "इंसान",
"कि होता है "असर" बहुत, "आरती" और "आज़ानों" में,

"करनी है "बसर" ज़िन्दगी तो,
किसी की "भलाई" में कर,
"वर्ना क्या "फ़र्क" है, "तुझमें" और "शैतानों" में,

"कुछ करके, पेश कर "इन्सानियत की मिसाल",
"बन जाए अलग "पहचान", तेरी इन "इंसानों" में,

"बन जाए अलग "पहचान", तेरी इन "इंसानों" में........
~~~~~~~~~~~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)