Friday, January 27, 2017

इन्सानियत भिखारी हो गयी है


"इंसानियत" "भिखारी" हो गयी है,
"गुनाहों" की "मदारी" हो गयी है,
'नहीं दिखता "चेहरा" किसी का भी "साफ़",
"निगाहों" की "लाचारी" हो गयी हैं,

"बिकने" लगे हैं "लोग" यहाँ बात-बात पर, 
"पैसों" से "वफादारी" हो गयी है,

"झूठ" की "नौकरी" करने वाले हैं सब यहाँ, 
"सच" की तो जैसे "बेगारी" हो गयी हैं,

"अपने "मतलब" में हैं "अंधे" सभी यहाँ,  
"फ़र्ज़" से अपने ही "गद्दारी" हो गयी है,

"सोशल नेटवर्किंग" पर सभी मसरूफ हैं यहाँ,
"रिश्तों" से तो अब "मग़ज़मारी" हो गयी हैं,

"उजालों" की "ख़्वाहिश" सभी रखते हैं यहाँ,
"अंधेरों" से निकलना "दुश्वारी" हो गयी है,

"नफरतों" का ही "साथ" उम्र भर निभाया गया,
"मुहब्बत" से तो "ज़िनाकारी" हो गयी है,

"नफरतों, की "बलि" चढ़ रही है "जिंदगी" सभी की,
"हर हाथ में जैसे "कटारी" हो गयी है,
"इन्सानियत" "भिखारी" हो गयी है,
"गुनाहों" की "मदारी" हो गयी है,
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)


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