Friday, January 27, 2017

इन्सानियत का दरिया


"किसी की "आँख" का "आँसू" 
"मेरी "आँखों" से "छलक" जाये,
"किसी की "साँस" "थमते" देख
"मेरा "दिल" भी "रुक" जाए,

"किसी के "ज़ख्मों" की "टीसों" पर,
"मेरी "रूह" भी "तड़प" जाये,
"किसी के "पैर" के "छालों" से
"मेरी भी "आह" निकल जाये,

"ऐं "ख़ुदा", ऐसे ही "जज़्बों" से तू मेरा "दिल" भर दे,
"मैं "क़तरा" हूँ, मुझे "इन्सानियत का दरिया" कर दे,

"किसी का "खून" "बहता" देख 
"मेरा भी "ख़ून" जम जाये,
"किसी की "दर्दभरी चीख़" पर, "मेरे भी "क़दम" उधर बढ़ जायें,

"किसी को "देख" कर "भूखा"
"मेरा भी "निवाला" रुक जाये,
"किसी का "सहारा" बनकर,
"मेरा भी "जीवन" "सफल" हो जाये,

"ऐं "ख़ुदा", ऐसे ही "जज़्बों" से तू मेरा "दिल" भर दे,
"मैं "क़तरा" हूँ, मुझे "इन्सानियत का दरिया" कर दे,

"मैं "क़तरा" हूँ, मुझे..............
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)

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