Monday, July 17, 2017

नफ़रतों के खिलाफ़ पदयात्रा



आज दिनांक 16/07/17 को *इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी* के तत्वाधान में शहर मुरादाबाद की अन्य तमाम दूसरी सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से, एक "सर्वधर्म, "शान्ति, सौहार्द्र, "सदभावना, पदयात्रा का आयोजन किया गया। जिसका शीर्षक था,
*समाज मे फैल रही "नफ़रतों" के ख़िलाफ़ "सर्वधर्म, "शान्ति, "सौहार्द्र, "सदभावना, पदयात्रा,* 
जिसके तहत आज *इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी* के बैनर तले शहर मुरादाबाद के तमाम सामाजिक संगठन, सामाजिक सोसाइटीयाँ, एवं समितियाँ जैसे :- 
*महानगर अमन कमेटी*, *सामाजिक समरसता मंच*
*माँ गंगा प्रदूषण समिति*, *एहसास सेवा संस्थान*, 
*अल हिन्द यूथ वेलफेयर सोसाइटी*
*पर्यावरण सचेतक समिति*,
*अखिल भारतीय लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष समिति*,
*प्रतिनिधि परिवार*,
*पीतल मज़दूर यूनियन*,
*अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार समिति*
आदि शहर की सामाजिक संस्थाओं के साथ ही साथ बहुत बड़ी संख्या में सभी धर्मों के धर्मगुरु, शहर के वरिष्ठ समाजसेवी, एवं बहुत बड़ी संख्या में शहर के सम्मानित लोग, दोपहर 12 बजे गवर्नमेंट कॉलेज पर एकत्रित हुए और आज हमारे देश और दिलों एवं हमारे "समाज में फैल रही धर्म आधारित, एवं जाति आधारित नफ़रतों को लेकर "गंभीर चिन्ता" व्यक्त की, और साथ इन नफ़रतों को देश और दिलों से मिटाने एवं देश मे सभी धर्मों के बीच मे शान्ति, सौहार्द्र, अमन, प्यार, भाईचारा, और सदभावना, क़ायम करने का संकल्प लिया। इसके बाद सभी लोगों ने मिलकर यह "सर्वधर्म, शान्ति, सौहार्द्र, सदभावना, पदयात्रा शुरू की, और गवर्नमेंट कॉलेज से चलकर मंडी चौक, अमरोहा गेट, टाउन हॉल, बाज़ार गंज, गुरहट्टी चौराहा, जेल रोड, जैन मंदिर होते हुए कम्पनी बाग़ स्थित गांधी पार्क पहुँचे, सभी लोगों ने अपने-अपने हाथों में सर्वधर्म की एकता, अखंडता, अमन, एवं भाईचारे, के लिखे हुए संदेश, और इन्सानियत को दर्शाते हुए प्ले-कार्ड ले रखे थे, पदयात्रा में काफ़ी संख्या में सभी धर्मों के छोटे बच्चे व महिलायें भी उपस्थित रहे। कम्पनी बाग़ में गांधी पार्क पर पहुँचने के बाद वहाँ स्थापित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति के चरणों मे बैठकर सभी धर्मों के धर्मगुरुओं एवं उपस्थित सभी सम्मानित लोगों ने एक साथ मिलकर देश में, एकता, अखंडता, शान्ति, सौहार्द्र, सदभावना, एवं अमन, और भाईचारा क़ायम रहने की दुआ की।
इस अवसर पर बहुत बड़ी संख्या में ये सभी सम्मानित लोग मौजूद रहे :- 

समाजसेवी राशिद सैफ़ी, नगर संत रामदास, मौलाना उमर फ़ारूक़, हबीब फुरकान, ज़ियाउल हसन अंसारी, मोहम्मद शादाब
इमाम मुफ़्ती सैय्यद फ़हद, शिया इमाम मुज़फ्फर तौराबी, सरदार गुरविंदर सिंह, पादरी पॉल सारस्वत, नीतू सक्सेना, गौतम सिंह, मनीष कुमार, अनवर अंसारी, नेपाल सिंह, हिदायत अली, ताहिर अब्बासी, कासिम ख़ान, दिलशाद अंसारी, मोहम्मद फ़राज़, रविन्द्रनाथ भाटिया, संगीता अग्रवाल, आदि उपस्थित रहे।


Friday, June 30, 2017

इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी का ईद मिलन समारोह



"आज दिनांक 27/06/17 को इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी की तरफ़ से कांठ रोड स्थित हिमगिरि कालोनी में ईद मिलन समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें शहर मुरादाबाद के तमाम वरिष्ठ एवं सम्मानित हर धर्म, हर वर्ग, हर जाति के लोग उपस्थित रहे। सोसाइटी के संस्थापक एवं अध्यक्ष राशिद सैफ़ी ने इस सम्बंध में बताया कि प्यार और मुहब्बत, अमन और  भाईचारे के इस मीठे त्यौहार "ईद" के उपलक्ष्य में आज सोसाइटी की तरफ़ से ये "ईद मिलन समारोह" आयोजित किया गया है। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ समाजसेवी सरदार गुरविन्दर सिंह, एवं पादरी पॉल सारस्वत रहे। इस अवसर पर सभी वक्ताओं ने  बोलते हुए कहा कि जिस तरह आज यहाँ ईद के शुभ अवसर पर एकता, भाईचारे, अमन और शान्ति का पैग़ाम दिया जा रहा है, उसी तरह के पैग़ाम पूरे देश मे देने की ज़रूरत है, हम सभी धर्मों, सभी वर्गों के लोगों को मिल-जुलकर एकता और भाईचारे का पैग़ाम पूरे देश मे फैलाना होगा, और इस देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को क़ायम रखते हुए सारी दुनिया को ये संदेश देना होगा कि भारत एक महान देश है, और इन्सानियत यहाँ का सबसे बड़ा धर्म और मज़हब है। 

इस मौके पर बहुत बड़ी संख्या में ये सभी लोग उपस्थित रहे। -- 
सोसाइटी के अध्यक्ष राशिद सैफ़ी, डॉ इरशाद हुसैन, सरदार गुरविन्दर सिंह, पादरी पॉल सारस्वत, पादरी डेनियल मसीह, अनुज अग्रवाल, गौतम सिंह, मनीष कुमार, रवीन्द्रनाथ भाटिया, शारिक सैफ़ी, पप्पू भाई, मीना भारद्वाज, हाजी सदाक़त हुसैन, अशरफ़ अली, जमशेद खान, माजिद खान, मोहम्मद फहीम, अजीत भाई, हारून, संजय भारद्वाज, मोहम्मद फ़ैज़, मोहम्मद शादान आदि उपस्थित रहे।।

हमारे बाद भी रहे हमारे कर्मों की याद

"कहा जाता है कि ज़िन्दगी के "कुछ लम्हों" को "यादगार" बनाना तो सभी चाहते हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग अक्सर यही सोचकर "निराश" हो जाते हैं कि ऐसा कोई "बड़ा काम" करना उनके बस की बात नहीं, और वे अपनी ज़िन्दगी के लम्हों को यादगार नहीं बना पाते, और "गुमनामी" के "अंधेरों" में ही जीवन "गुज़ार" देते हैं।
"दरअसल, हमारे दुनिया से जाने के बाद हमारी यादगार कैसी हो, इसे लेकर लोग अक़्सर "ग़फ़लत" में ही रहते हैं, यह तो "मुमकिन" नहीं कि सभी लोग "ऐतिहासिक शख़्सियत" बनने की "क्षमता" या "कुव्वत" रखते हों, फिर ऐसा क्या किया जाये जिससे हमारे जाने के बाद भी हमारे द्वारा किये गए कामों की "याद" बाक़ी रहे ?
"असल में, ज़िन्दगी में किसी ने "बड़ा काम" किया या "छोटा", इसकी कोई "अहमियत" नहीं होती, अहमियत इस बात की होती है कि आपने अपने "हाथों" से अपनी "आत्मा" की आवाज़ पर कुछ ऐसा काम किया जो पहले नहीं था, यह सचमुच "सोचने वाली" बात है कि जो बरसों पहले हमारे आस-पास "पीपल, "बरगद, जैसे पेड़ लगा गये क्या उनका "योगदान" अखबारों की "सुर्खियों" में रहने वालों से कम है ? कुछ करके दिखाने का मतलब यह नही कि हमे "पद-प्रतिष्ठा", और "पैसे" कमाने पर खरा माना जाये, बल्कि कुछ करके दिखाने का "असल मतलब" यह है कि हमारा किया हुआ कोई काम "दिल" को "छूता" हो, और हमारे जाने के "बाद" भी लोगों के दिलों को "छूता" रहे। अक़्सर लोग अपने "छोटे-छोटे कामों" के द्वारा भी लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं, और हमेशा बनाये रहते हैं।
"तो दोस्तों, अपने जीवन में "छोटे-बड़े" की परवाह किये बग़ैर कुछ ना कुछ ऐसे काम करें, जिनसे आपके इस "दुनिया" से जाने के "बाद" भी आपके द्वारा किये गए कामों की वजह से आप लोगों के "दिलों" में "ज़िन्दा" रहें। क्योंकि यही जीवन है, और यही इन्सानियत है।  (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

औरत कहाँ सुरक्षित ??

"दोस्तों, आज हमारे समाज मे औरतों के ऊपर हो रहे "अत्याचारों, "बलात्कार, "छेड़छाड़, "दहेज हत्या, "शोषण, और "घरेलू हिंसा आदि को देखते हुए हमारी "सरकारें, "पुलिस व हमारे "सामाजिक संगठन" औरतों के "हक़, "न्याय, और "सुरक्षा" की बात तो करते हैं, लेकिन ये नही बताते हैं कि औरत आज आख़िर "सुरक्षित" है कहाँ ?? 
"क्या औरत "घर मे सुरक्षित है ? क्या औरत "खेत" मे सुरक्षित है ? क्या औरत "थानों" में सुरक्षित है ? क्या औरत "स्कूल-कॉलेजों" में सुरक्षित है ? क्या औरत "अस्पताल" में सुरक्षित है ? नहीं बिल्कुल नहीं !! 
इनमें से सभी जगहों पर वह बार-बार "हमलों" और "शोषण" का शिकार हुई है। 
"दरअसल, औरत जब भी किसी हमले, किसी शोषण का शिकार हुई, तब हमने औरत की सुरक्षा(Safety) को लेकर "कड़े कानून", "जल्द न्याय", और उसके लियें "संसाधनों" की बहुत बातें कीं, लेकिन इसके बावजूद अगर देखें तो औरत को सबसे ज़्यादा "असुरक्षित" पाया, अदालतें थक चुकी हैं, नेताओं की जुबानें भी थक गयी हैं और कभी-कभी बहक भी जाती हैं, औरतों के लियें न्याय और सुरक्षा मांगने वाले व "जुलूस" निकालने वाले सामाजिक संगठन भी थक चुके हैं, लेकिन औरत के लियें एक "सुरक्षित स्थान" अभी तक तय नहीं कर पाए हैं। औरत असुरक्षित "क्यों" है, इसके "बुनियादी कारणों को "टटोला" जाना चाहिए, 
"असल में, औरतों पर हमले की "शुरुआत हमारी "भाषा" से ही हो जाती है, आज हमारी भाषा में औरतों पर "गालियों" के "हमले" एक आम बात मानी जाती है, हम बातों ही बातों में औरतों पर गालियों के ज़ुबानी हमले करते रहते हैं, और ये हमले हमें "रूटीन" लगने लगे हैं। और इन्हीं भाषाई हमलों के साथ औरतों को लेकर हमारी "सोच" भी बेहद "निम्न स्तर" की हो चुकी है, जिसमें हम औरत को केवल "भोग की वस्तु" समझते हैं, और उसे केवल "वासना की दृष्टि" से देखते हैं जबकि वह हमारी "जननी" है, अगर वो ना होती तो हम भी "ना होते"।
"दरअसल, आज अगर औरत को हमे "सम्मान" व "न्याय" देना है तो सबसे पहले अपनी "भाषा" मे उसे "सम्मान" दें, और इसके साथ ही साथ हम अपनी "सोच" में "बदलाव" करके औरत को "सम्मान व "न्याय देने के अपने "इरादों" पर "मुहर" लगायें, तब ही औरत "घर से लेकर "बाहर तक "सुरक्षित" रहेगी, अन्यथा अगर हम ऐसा नही कर पाते हैं तो हमारे लियें "औरतों" की "सुरक्षा" की बात करना "बेमानी" ही है।        (धन्यवाद)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

इन्सानियत का शपथ पत्र

दोस्तों, जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी द्वारा किये जा रहे कार्यों, और उनको करने का "एकमात्र मक़सद" बस यही है कि समाज में "इन्सानियत" ज़िन्दा रहे, व हम सभी इन्सान सही मायनों में इन्सानियत से "जीना" सीख जायें, और इसी के साथ ही समाज में एक अच्छा "सन्देश" भी जाये, और लोग "नेक, और "भले कामों से "प्रेरणा" लेकर भलाई के काम करें। सोसाइटी द्वारा किये जा रहे इसी तरह के कामों की "कड़ी" में आज एक कड़ी और "जोड़ना" चाहता हूँ, जिस कड़ी का नाम है- इन्सानियत का शपथ पत्र इसमें हम सोसाइटी की ओर से एक "शपथ पत्र" तैयार कर रहे हैं, जिसमें हम अपने "समाज, अपने "देश, अपने "राज्य, अपने "शहर, व अपने "गली-मोहल्लों" की "भलाई, "विकास, और "तरक़्क़ी से सम्बंधित कुछ "बिन्दुओं" पर ये शपथ पत्र तैयार करेंगे, व "नुक्कड़ सभाओं" द्वारा, एवं "घर-घर जाकर ये शपथ पत्र हम लोगों को "वितरित" करेंगे, इस शपथ पत्र में कई तरह के बिंदु जैसे - देश एवं समाज हित में "बिजली बचाना", अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये "पानी बचाना", सरकारी "संपत्तियों एवं "संपदाओं को "नुकसान ना पहुँचाना, "सामाजिक बुराइयों" के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक करना, ग़रीब, मजबूर, असहाय, दीन-दुखियों की मदद करके "इन्सानियत की मिसाल" पेश करना आदि कुछ "महत्वपूर्ण बिंदु" तैयार किये जायेंगे, व सोसाइटी की तरफ़ से लोगों में ये शपथ-पत्र बाँट कर उन्हें "शपथ" दिलायी जायेगी कि वे "देश हित" में "समाज हित" में इन सब भलाई के कार्यों को करने की कोशिश करें, व दूसरों को भी अच्छे काम करने को "प्रेरित" करें, और साथ ही साथ समाज में जो कोई "अच्छा काम" कर रहा है उसका वह अच्छा काम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाए जिससे दूसरे भी "प्रेरणा" लेकर "नेकी" और "भलाई" के काम कर सकें।
दोस्तों, बहुत जल्द ये शपथ पत्र तैयार हो जायेगा, और इसे लेकर हम "आपके दरवाज़े" पर इस "आशा" के साथ आयेंगे कि "इन्सानियत के नाते", और इन्सानियत को ज़िन्दा रखने हेतु इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी को आपका अमूल्य सहयोग अवश्य मिलेगा।। (धन्यवाद)
(हमारी इस "मुहिम" में जो लोग भी सोसाइटी से "जुड़कर" "समाजसेवा" और "इन्सानियत" के काम करना चाहते हैं, उनका हार्दिक स्वागत है, वे सोसाइटी की "सदस्यता" ले सकते हैं, सदस्यता "पूर्णतया निःशुल्क" है,)
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"राशिद सैफ़ी" मुरादाबाद
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

आज मुल्क़ में इन्सानियत रो रही है

"आज "मुल्क़" में "इन्सानियत" "रो" रही है, 
"ज़िन्दादिली" और "एकता" शायद कहीं "सो" रही है,

"प्यार" और "मुहब्बत" की बातें सिर्फ "किताबों" में ही रह गयीं, 
"आज "हर मोड़" पर "निहायत बेशर्मी" हो रही है,

"इन्सान" की "संवेदनाएं" बन गयी हैं "तमाशा",
"इन्सानियत" की "भावनाएं" भी कहीं "खो" रही हैं,

"प्यासे" को "पानी" क्या "पिलायेगा" कोई, 
"प्यास" तो "चौखट" पर ही "दम" तोड़ रही है,

"कोई नहीं करता "मदद" यहाँ "किसी" की,
"खुदगर्ज़ी" की "बारिश" ही हमें "भिगो" रही है,

"दिल" को हमने अपने "सामान" बना डाला है,
"बाज़ार" में बस इसकी ही "ख़रीदारी" हो रही है,

"दुःख" और "दर्द" अब हमारे अन्दर कहाँ, ?
"इन्सान" होने की "पहचान" शायद कहीं "खो" रही है,  

"मंज़िलों" के "रास्ते" ख़ुद हमने ही "बंद" कर डाले, 
"अब इनको "खोलने" में "परेशानी" क्यूँ हो रही है,?

"प्यार" और "मुहब्बत" की "डोर" ख़ुद ही "तोड़ते" जा रहे हैं हम, 
"और फिर कहते हैं, ये "डोर" "कमजोर" क्यूँ हो रही है,

"यह सारे "सवाल" ख़ुद हमने ही "खड़े" किये हैं, 
"तो अब "जबाब" देने में "परेशानी" क्यूँ हो रही है ?

"तो अब जबाब देने में परेशानी क्यूँ........????
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी" ने किया पर्वतारोही रवि के "माता-पिता" एवं "गुरु" गुरविन्दर सिंह का "सम्मान"


"आज दिनांक 08/06/17 को इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी ने मुरादाबाद और देश की शान पर्वतारोही रवि कुमार के माता-पिता एवं गुरु सरीखे सरदार गुरविन्दर सिंह का सम्मान किया। इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी के सभी सदस्य आज शाम 6 बजे पर्वतारोही रवि के भोला सिंह की मिलक स्थित घर पर पहुँचे एवं रवि के माता-पिता और गुरु सरीखे सरदार गुरविन्दर सिंह का सोसाइटी की तरफ़ से फूल मालायें पहना कर एवं शॉल ओढ़ा कर सम्मानित किया। इस सम्बन्ध में बताते हुए सोसाइटी संस्थापक एवं अध्यक्ष राशिद सैफ़ी ने बताया कि रवि जैसी महान आत्मा को जन्म देने वाले माता-पिता तो धन्य हैं ही, साथ ही साथ महानता की उसी श्रेणी में रवि को मार्गदर्शन देने वाले, एवं जीवन में आगे बढ़ने के लियें उत्साहवर्धन करने वाले, उनके गुरु सरीखे गुरविन्दर सिंह भी सम्मान के हक़दार हैं। क्योंकि गुरु हमें दुनिया में "जीने का सलीका, और जीवन में आगे बढ़ने की "प्रेरणा, एवं दुनिया में अपने माता-पिता, और देश का नाम "रौशन करने की शिक्षा एवं प्रेरणा देते हैं। इसीलिए आज इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी के द्वारा रवि के "माता-पिता" एवं "गुरु सरीखे" सरदार गुरविन्दर सिंह दोनों का ही सम्मान किया गया।
इस मौके पर सोसाइटी के सभी सदस्य, रवि के परिवारजन, एवं भारी संख्या में ग्रामवासी उपस्थित रहे।
अध्यक्ष राशिद सैफ़ी, विनय विशनोई, डॉ इरशाद सैफ़ी, सरदार गुरविन्दर सिंह, शालिनी वर्मा, रविंद्रनाथ भाटिया, अनुज अग्रवाल, वसीम अहमद, नीरू रानी, मनोज, गौरव, आदि उपस्थित रहे।।

देश के "गौरव" पर्वतारोही "रवि कुमार" को "मार्मिक श्रद्धांजलि"







"दोस्तों, कहा जाता है कि "आसमान" "छूने" की "तमन्ना" तो हर इंसान को रहती है, मगर उसे छु कोई-कोई ही पाता है, और वही छूता है, जिसके अन्दर "हौसला" हो, कुछ कर गुज़रने की तमन्ना हो, "इतिहास" रचने का "जज़्बा" हो, इसी तरह के कुछ इन्सानों में से एक "महान आत्मा" मुरादाबाद और देश का "गौरव" "पर्वतारोही रवि कुमार" थे, थे इसलियें लिख रहा हूँ क्योंकि आज सारी "उम्मीदों" और "आशाओं" पर विराम लग चुका है, और देश का नाम पूरे "विश्व" में "रौशन" करने वाले देश के गौरव पर्वतारोही रवि कुमार का "शव" आज रात करीब 8 बजे मुरादाबाद पहुँचेगा, रवि कुमार अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, एशिया, और अब "माउंट एवरेस्ट" सहित दस देशों की चोटियों पर "फ़तह" हासिल करके हमारे देश का "तिरंगा" फ़हरा चुके हैं, और देश का नाम सारे विश्व में रौशन कर चुके हैं, मगर हमारी "बदक़िस्मती" है कि आज रवि कुमार हमारे बीच आ रहे हैं तो मृत अवस्था में, मगर हम ऐसी महान आत्मा को मृत नहीं मानते, रवि कुमार आज भी हमारे दिलों में "ज़िन्दा हैं, व हमेशा रहेंगे, 
रवि तुम्हें सलाम !!!
आज हम इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी की ओर से बेहद "दुःखी" होकर पर्वतारोही रवि कुमार को बेहद "मार्मिक श्रद्धांजलि" दे रहे हैं। ईश्वर आपकी आत्मा को "शांति" दें।। (आमीन)
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(राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

मुरादाबाद एवं देश के गौरव पर्वतारोही रवि कुमार की गुमशुदगी को लेकर प्रधानमन्त्री को पत्र

जैसा कि सबको विदित है कि मुरादाबाद शहर के रहने वाले "रवि कुमार" देश का "गौरव" बढ़ाने वाले एक "साहसी पर्वतारोही" हैं, जिन्होंने दुनिया की कई "पहाड़ी चोटियों" को फ़तह करके अपने देश का "तिरंगा झंडा" वहाँ फ़हराया है, और हमारे देश का नाम "रौशन" किया है। इसी कड़ी में पर्वतारोही रवि कुमार ने शनिवार को दुनिया की सबसे ऊँची चोटी "माउंट एवरेस्ट" को फ़तह कर लिया और अपने देश का तिरंगा झंडा माउंट एवरेस्ट पर फ़हरा कर हमारे देश का "गौरव" और "मान-सम्मान" बढ़ाया, ये हम सभी मुरदाबाद वासियों एवं देशवासियों के लियें बड़ी "ख़ुशी" और "गर्व" की बात है। लेकिन इसी के साथ-साथ बड़े "दुःख" और "पीड़ा" का विषय ये है कि उसी दिन से पर्वतारोही रवि कुमार का पता नहीं चल रहा है, नेपाल सरकार ने तो कल उनकी "मौत" की पुष्टि भी कर दी है, जिसमे उन्हें माउंट एवरेस्ट चोटी से लौटते हुए गिरने से मौत होना दर्शाया गया है, इस दुःखद समाचार से मुरादाबाद शहर ही नहीं पूरा देश एवं रवि कुमार का परिवार भी बेहद "सदमे" में है, और इस ख़बर पर किसी को भी "विश्वास" नहीं हो रहा है, क्योंकि अभी तक पर्वतारोही रवि कुमार का "शव" भी नहीं मिला है, रवि कुमार से मेरी पहचान एक अच्छे दोस्त और भाई की तरह थी, मुरादाबाद के "वरिष्ठ समाजसेवी" आदरणीय "सरदार गुरविन्दर जी" के साथ ना जाने कितने "समाजसेवा" के "कार्यक्रमों" में हमने और रवि कुमार ने एक साथ अपनी "सेवायें" दी हैं, लेकिन आज उनके इस तरह से माउंट एवरेस्ट की चोटी से गायब होने की घटना से मन बहुत "दुःखी" है। मुझे एवं मुरादाबाद शहर के एक-एक व्यक्ति, उनके परिवार, और देश के सभी लोगों को ये पूर्ण "विश्वास" और "आशा" है कि पर्वतारोही रवि कुमार "ज़िन्दा" हैं और "सही-सलामत" हैं, और इसी विश्वास और आशा के साथ हम सब अपने-अपने "ख़ुदा" और "ईश्वर", से "प्रार्थना" करते हैं कि देश का गौरव रवि कुमार जल्द से जल्द "सकुशल, "सही-सलामत वापस लौट आये। और साथ ही हम अपनी सोसाइटी, इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी की तरफ़ से देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी से ये "अपील" और "निवेदन" करते हैं कि जल्द से जल्द पर्वतारोही रवि कुमार की "तलाश" और "खोज" करायी जाये, जिस तरीके से भी संभव हो उन्हें खोजकर वापस लाया जाये, एवं हमारे देश का मान-सम्मान और गौरव बढ़ाने वाले इस साहसी पर्वतारोही रवि कुमार के परिवारवालों, मुरादाबाद शहर के लोगों और देश की सारी जनता की "आँखों" में खुशियों के "दीप" जलायें। 
             (धन्यवाद)
"निवेदक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद"
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

Wednesday, April 26, 2017

छत्तीसगढ़ के सुकमा में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि








"आज दिनांक 25/04/2017 को इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी की ओर से एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कम्पनी बाग़ के गांधी पार्क स्थित शहीद स्मारक पर किया गया, जिसमे कल छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों/आतंकवादियों द्वारा किये गये हमले में शहीद हुए हमारे 26 जवानों को मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि दी गयी, एवं दो मिनट का मौन रखकर मरने वाले शहीदों की आत्मा की शान्ति के लियें प्रार्थना की गयी, साथ ही इस हमले में गंभीर रूप से घायल दूसरे कई जवानों, शेर मोहम्मद आदि के जल्द से जल्द स्वस्थ होने के लियें दुआ की गयी।।
इस बारे में बोलते हुए *इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी* के अध्यक्ष *राशिद सैफ़ी* ने बताया कि नक्सलवाद और आतंकवाद दोनों ही हमारे देश के लियें एक अभिशाप है जिसके तहत हमारे ना जाने कितने बेगुनाह जवान हर साल अपनी शहादत देते हैं, आज से सात साल पहले भी छत्तीसगढ़ के इसी सुकमा में नक्सलियों ने हमारे 76 जवान शहीद कर दिए थे, और इसी तरह के हमलों में हर साल हमारे सैंकड़ों जवान और बेगुनाह लोग शहीद हो जाते हैं, और कल भी इसी तरह के हमले में हमारे सीआरपीएफ के 26 जवान शहीद हुए हैं। ये एक इन्सानियत को शर्मसार करने वाला कृत्य है, इन्सानियत किसी भी इंसान को किसी दूसरे इंसान की जान लेने की इजाज़त बिल्कुल नहीं देती, *इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी* इन्सानियत को शर्मसार करने वाले इस कृत्य की कड़े शब्दों में घोर निंदा, एवं भर्त्सना करती है, एवं मरने वाले शहीदों के परिवारों के प्रति संवेदना और दुःख व्यक्त करती है, और उनके साथ खड़ी है। और साथ इस हमले में गंभीर रूप से घायल सभी जवानों ख़ास तौर पर शेर मोहम्मद जैसे जवान, जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर नक्सलियों से जमकर टक्कर ली, और ख़ुद घायल होते हुए भी अपने कई साथियों को कंधे पर उठाकर उनकी जान बचाई, "इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी" शेर मोहम्मद की बहादुरी को सलाम करते हुए सभी घायल जवानों के जल्द से जल्द स्वस्थ होने की कामना करती है, और मरने वाले जवानों की आत्मा की शान्ति के लियें दुआ करती है।।
इस मौके पर मुख्य रूप से सोसाइटी के सभी कार्यकर्ता एवं काफी संख्या में शहर के वरिष्ठ नागरिक उपस्थित रहे। -
अध्यक्ष राशिद सैफ़ी, डॉ. इरशाद सैफ़ी, सरदार गुरविंदर सिंह, मीना भारद्वाज, फ़रीद अहमद, शारिक सैफ़ी, सदाकत हुसैन, रिज़वान, आकिल, डॉ. वसीम, नीरू कुमारी, लवकुश कंछल, मोहम्मद फ़ैज़, आदि उपस्थित रहे।।

Thursday, April 13, 2017

भारतीय पूर्व नोसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव की फाँसी रोकने को पाकिस्तानी उच्चायुक्त के नाम ज्ञापन









"आज दिनाँक 13/04/17 को इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी की तरफ़ से मुरादाबाद के जिलाधिकारी महोदय ज़ुहैर बिन सग़ीर के माध्यम से एक ज्ञापन, पाकिस्तान के उच्चायुक्त महोदय अब्दुल बासित के नाम दिया गया, जिसमें पाकिस्तानी सैन्य कोर्ट द्वारा भारतीय नोसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को इन्सानियत के नाते फाँसी ना देने का विनम्र निवेदन किया गया। इस सम्बन्ध में बताते हुए इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी के संस्थापक/अध्यक्ष राशिद सैफ़ी ने बताया कि हम अपनी सोसाइटी की ओर से मानवता के नाते ये ज्ञापन देकर पाकिस्तानी सरकार से विनम्र अनुरोध कर रहे हैं कि बिना किसी सबूत, बिना किसी सरकारी मदद दिये, बिना कोई आरोप साबित हुए भारत के पूर्व नोसेना अधिकारी को फाँसी देना, पूरी मानव जाति को फाँसी देने जैसा है, एवं इन्सानियत की हत्या है, और मानव अधिकारों का हनन है। क्योंकि जब कोई इंसान फाँसी के फंदे पर झूलता है तो सिर्फ वो अकेला ही फाँसी नही चढ़ता है, बल्कि उसके साथ कई और ज़िंदगियाँ भी फाँसी चढ़ती हैं, उसके माँ-बाप, उसके भाई-बहन, उसकी पत्नी, उसके बच्चे, आदि, और फाँसी के सम्बन्ध में इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी के ये मानना है कि फाँसी की सज़ा पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध होना चाहिये, दुनिया के किसी भी देश मे फाँसी देने का प्रावधान नही होना चाहिये, क्योंकि अगर हम किसी को ज़िन्दगी दे नही सकते, तो हमे किसी की ज़िन्दगी लेने का भी कोई अधिकार नही है। इसीलिए हम सोसाइटी की तरफ़ से पूरी दुनिया के देशों से ये मांग करते हैं कि फाँसी को पूरी तरह से बंद किया जाये, और उसकी जगह आरोप साबित होने पर उम्र क़ैद या आजीवन कारावास की सज़ाएं दी जाएं।।
ज्ञापन देने के इस मौके पर ये सभी लोग मौजूद रहे - सोसाइटी के अध्यक्ष राशिद सैफ़ी, सचिव डॉ इरशाद सैफ़ी, फ़रीद अहमद, विनय विशनोई, वरिष्ठ समाजसेवी अशोक शर्मा जी आदि उपस्थित रहे।।

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"राशिद  सैफ़ी "आप" मुरादाबाद"
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

Thursday, April 6, 2017

कामयाबी का शॉर्टकट



"कहा जाता है कि ज़िन्दगी में "पैसा, "शोहरत, और "ताक़त, "हासिल" करने से कई गुना "मुश्किल है अपनी "अच्छाइयों" को बनाये रखना, और दूसरों की भलाई के लियें काम करना।
"दरअसल, काम अच्छा हो, और उसे करने का "तरीका" भी अच्छा हो यह ज़रूरी नहीं, हम इन्सान अक्सर "सफल" या "कामयाब" होने के चक्कर में कई बार "शॉर्टकट" ही नहीं, कई ऐसे "रास्ते" भी अपना लेते हैं जो सामाजिक, या नैतिकता, किसी भी पैमाने पर "फिट" नहीं बैठते। कामयाब होने के चक्कर में हम अक़्सर बहुत कुछ "भूल" जाते हैं। 
"असल में, आज एक आम व्यक्ति के लियें बेहतर ज़िन्दगी जीने के लियें "आर्थिक, "आत्मनिर्भरता, "ताक़त, "शोहरत, और "प्रतिष्ठा, ये सभी चीज़ें जो उसके पास नहीं होतीं, और दूसरे के पास होती हैं, उसे ये मानने पर "मजबूर" करती हैं, कि दूसरा व्यक्ति "सफल" है, कामयाब है, और यही सफलता एक "परदे" का काम भी करती है, जो दूसरे व्यक्ति की "बुराइयाँ" भी इसी परदे में "छिपा" लेती है।
"दरअसल, आज हम इन्सानों की "सोच" और "मानसिकता" इस तरह की हो चुकी है कि हमें "आनन-फानन" में सफलता चाहिये, चाहे उसके लिये हमें कोई शॉर्टकट रास्ता अपनाना पड़े, या कोई अनैतिक काम करना पड़े, हम सफलता पाने के चक्कर में सबकुछ कर गुज़रते हैं। लेकिन सफ़लता पाने का मतलब महज़ दौलत, शोहरत, और ताक़त, हासिल करना ही नहीं है, वरन अपने-आप से ज़्यादा दूसरों की भलाई के बारे में सोचना, लोगों के भले के लियें कार्य करना, और दूसरों के दुःख-दर्द समझकर उन्हें दूर करने के "प्रयास" करना ही "असली सफलता" है, क्योंकि हमारी जेब में अगर "हज़ारों रुपया" हो, लेकिन अगर हम किसी "नेत्रहीन" या "कमज़ोर" को सड़क पार कराने को दो बार "सोचें", तो हमारे वे सारे रूपए बेकार हैं, हमारी दौलत शोहरत किसी काम की नहीं, हमें यह चाहिये कि जब भी हम कोई काम करें, तो इस बात को ध्यान में रखकर करें, कि हमारे उस "काम" में हम जो भी कुछ "अच्छा" या "बुरा" कर रहे हैं वह "देर-सवेर" हमारी ही तरफ़ पलटकर "वापस" ज़रूर आयेगा। एक कहावत इसी बात को चरितार्थ भी करती है- करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय, बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से होय
"तो दोस्तों, हमें और आपको चाहिये कि सफलता या कामयाबी पाने के चक्कर किसी शॉर्टकट, या अनैतिक काम में "लिप्त" ना हो जायें, और सफलता का पैमाना सिर्फ़ दौलत, शोहरत, और ताक़त, को ही मानें, बल्कि अपने दिल में दूसरों के लियें "प्यार, "दया, और "हमदर्दी, रखते हुये ईश्वर के बनाये हुए सभी "प्राणियों" की भलाई के लिये कार्य करने की "कोशिश" करें, तभी हम सच्चे मायनों में सफल हो पायेंगे।।                  
              (शुक्रिया)
~~~~~
(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

इन्सान हमेशा से गंदा ना था



"इन्सान" हमेशा से "गंदा" ना था,
"साथ में लाया "लालच" का ये "फंदा" ना था,

"सियासतों" में "मज़हबों" का 
ये "धंधा",
किसी "दौर" में भी "मंदा" ना था,

"लोग "बेबजह" ही "हैरान" "परेशान" होते हैं,
"इन्सान ये "हमेशा" के लियें "ज़िन्दा" ना था,

"महफ़िल" से "उठकर" चल दिये थे क्यूँ "लोग",
"यूँ तो किसी ने "मांगा" "चंदा" ना था,

"दुनिया की "शतरंज" क्या जाने राशिद,
पागल था, दीवाना था, पर ख़ुदा का नेक बंदा ना था,  

"इन्सान" हमेशा से..............
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

दुनिया को बुरा हमने ही बनाया दोस्तों



"दुनिया" को "बुरा" "हमने" ही बनाया दोस्तों,
"आईना" हमेशा "दूसरों" को ही दिखाया दोस्तों,

"जाना था "मंजिल-ए-राह" में "मुद्दतों" से,
"लेकिन खुद "बैठे" और सबको साथ "बिठाया" दोस्तों,

"अपनी ही "बदनामियों" में "मुब्तिला" होकर,
"नाम" हमने भी ख़ूब "कमाया" दोस्तों,

"कल" की "ख़बर" नहीं किसी को यहाँ,
"शतरंजी चालें" आख़िर क्यों है "जमाया" दोस्तों,

"हम" में तो ना "दिल" है ना ही "जान" है "राशिद",
"अपनी" ही "लाश" को "कब" से "सजाया" दोस्तों,

"दुनिया को बुरा हमने...........
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

"धर्म" की कोई "दुकान" "खोल" लीजिये


"धर्म" की कोई "दुकान" खोल लीजिए,
"सियासत" के "सामान" भी "मोल" लीजिये,

"कामयाबी" के नए "पैमानों" में लोगों,
"थोड़े से "झूठे" मुस्कान "बोल" लीजिए,

"उस जहाँ" की "ख़रीदारी" से पहले दोस्तों,
"अपने यहाँ" के "मकान" "तोल" लीजिए,

"रौशनी" दिखाने वाले "दलालों" से यारों,
"पहले "जान" उनके "पोल" लीजिए,

"गाता" है "गीत" "सुधार" का एक "राशिद", 
"अब "आप" भी "ढोल" "तान" लीजिए,

"धर्म" की कोई "दुकान".........
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी

Wednesday, March 29, 2017

महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, शोषण, एवं घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ जागरूकता सभा






"आज दिनांक 28/03/17 को इन्सानियत वेलफेयर की एक मीटिंग हिमगिरि कालोनी स्थित कार्यालय पर सम्पन्न हुई, जिसमे सोसाइटी के सभी सदस्य एवं भारी संख्या में आम लोग उपस्थित रहे। बैठक में समाज में व्याप्त बुराइयों एवं उनके निवारण और उनके प्रति जागरूकता फैलाने के बारे में विस्तार पूर्वक चर्चा हुई, जिसमे सोसाइटी के सदस्यों के अलावा वहाँ मौजूद सभी आम लोगों ने भी अपने विचार रखे, और समाज में फ़ैली बुराइयों के ख़िलाफ़ लोगों में जागरूकता लाने का कार्य करने की शपथ ली। इस सम्बन्ध में बताते हुए सोसाइटी के संस्थापक एवं अध्यक्ष राशिद सैफ़ी ने बताया कि इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी आने वाले दिनों कई एजेंडों पर काम करने को प्रतिज्ञाबद्ध है। जिसके तहत आने वाले समय में सबसे पहले महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, शोषण, एवं घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ लोगों में जागरूकता फैलाने का काम किया जायेगा। उन्होंने बताया कि मुरादाबाद शहर में 23 स्थान चिन्हित किये गए हैं जहाँ पर महिलाओं से छेड़छाड़, शोषण, आदि जैसी घटनायें ज़्यादा घटती हैं, सोसाइटी की ओर से उन सभी स्थानों पर नुक्कड़ सभाएं की जाएँगी एवं लोगों में महिलाओं के प्रति सम्मान और आदर का भाव पैदा करने का काम किया जायेगा। उन्होंने बताया कि सरकारें, और पुलिस, तो महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में कानून के तहत अपना काम करते ही हैं, लेकिन हैं पुरुष समाज को भी महिलाओं के प्रति अपनी सोच और मानसिकता बदलने की ज़रूरत है, तभी पूरी तरह से हम महिलाओं को सम्मान दे पायेंगे। और महिलाओं के प्रति हमारा ये सम्मान और आदर इसलियें भी ज़रूरी है क्योंकि महिलाओं के वजूद से ही हमारा वजूद क़ायम है। अगर महिलाएं नहीं तो हम भी नहीं। और इसी उद्देश्य को लेकर इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी आने वाले दिनों में काम करेगी।
इस अवसर पर मुख्य रूप से ये सभी लोग मौजूद रहे-
राशिद सैफ़ी, डॉ इरशाद सैफ़ी, फरीद अहमद, विनय विशनोई, सदाक़त हुसैन, मीना भारद्वाज, हक़ीम राशिद रज़ा, सुशील भटनागर, शमीम अहमद, शारिक सैफ़ी, ज़मीर अहमद, पप्पू भाई, मास्टर यासीन, ताहिर हुसैन, यासीन सैफ़ी, नासिर हुसैन, ज़ाकिर हुसैन, आदि मौजूद रहे।।

Wednesday, March 1, 2017

समाज में फैली सामाजिक बुराइयों, जैसे जुएबाज़ी, सट्टेबाज़ी, शराबबाज़ी, नशेबाज़ी, आदि के ख़िलाफ़ "जागरूकता अभियान सभा"










"आज दिनांक 01/03/2017 को *इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी* द्वारा समाज में फैली सामाजिक बुराइयों, जैसे जुएबाज़ी, सट्टेबाज़ी, शराबबाज़ी, नशेबाज़ी, आदि के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक करने एवं इन सब बाज़ियों से समाज को हो रहे नुक़सान बताने के उद्देश्य से *जागरूकता अभियान* शुरू किया गया। जिसके तहत आज सोसाइटी की तरफ से एक *जागरूकता अभियान सभा* का आयोजन, हिमगिरि कालोनी स्थित गड्डा कालोनी में नोगज़ा शाह ज़ियारत के पास किया गया, जिसमें सोसाइटी के सभी सदस्य मौजूद रहे।

इस सभा के सम्बन्ध में बोलते हुए सोसाइटी के संस्थापक और अध्यक्ष *राशिद सैफ़ी* ने बताया कि आज हमारा समाज जुए, सट्टे, शराब, और नशे, जैसी बुराइयों से बर्बाद हो रहा है, बड़ों के साथ-साथ छोटी-छोटी उम्र के किशोरों में भी ये सब बुराइयाँ फैलती जा रही हैं। और नशे जैसी घातक चीज़ का तो ये आलम है कि अब ये नशे की लत हमारे पढ़ने लिखने वाले बच्चों तक में फैलने लगी है। स्कूलों, कॉलेजों, में भी तमाम अराजक तत्व इस नशे को पहुँचा रहे हैं, ये एक गंभीर एवं चिन्ता का विषय है। आज समाज में फ़ैल रही इन सब बुराइयों और इन बुराइयों के द्वारा समाज को दूषित करने में कहीं ना कहीं हम इंसान ही "प्रत्यक्ष, या "अप्रत्यक्ष, रूप से ज़िम्मेदार हैं। क्योंकि हम में से ही कुछ लोग इन बुराइयों को कर रहे हैं, और हम में से ही कुछ लोग इसे देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। इसलियें इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी जोकि एक सामाजिक संस्था है, और समाज में किसी भी तरह के इन्सानियत के खिलाफ हो रहे काम के ख़िलाफ़ लोगों में जागरूकता फैलाती है, एवं समाज में हो रहे इन्सानियत और भलाई के कामों को लोगों के सामने लाकर, समाज के लोगों की भलाई करने का काम कर रही है। अपने इसी मक़सद और उद्देश्य को लेकर इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी ने आज इस जागरूकता अभियान सभा का आयोजन किया, और लोगों को इन सब बुरी लतों, जुआ, सट्टा, शराब, नशा आदि, के द्वारा होने वाले नुक़सान और इसका बुरा असर हमारी आने वाली नस्लों पर पड़ने के बारे में लोगों को बताया। और इन बुरी लतों को छोड़ने को लोगों को प्रेरित किया। सोसाइटी की ओर से निरंतर इस तरह के अभियान जारी रहेंगे।।
इस जागरूकता अभियान सभा में सोसाइटी के सभी सदस्य, एवं भारी संख्या में ये सभी लोग उपस्थित रहे। - राशिद सैफ़ी, डॉ इरशाद सैफ़ी, फरीद अहमद, विनय विशनोई, हसीब आलम, शारिक सैफ़ी, हसीन अहमद, यामीन सैफ़ी, सदाक़त हुसैन, इदरीस अहमद, डॉ अब्दुल बारी, दूल्हा जान, ख़ुशीराम, सरताज, मो. आरिफ, कमरुल हुसैन, पप्पू भाई, हकीम राशिद, आदि उपस्थित रहे।।

Sunday, February 26, 2017

बड़ी सोच रखें बड़ा ही होगा


"कहा जाता है कि जो इंसान "बड़ा" सोचता है वही एक दिन "बड़ा" करके भी दिखाता है। और जिसके सोचने की "शक्ति" बेहद "संकुचित(छोटी)" होती है, वह व्यक्ति कभी कुछ बड़ा या अच्छा नहीं कर पाता है।
"दरअसल, अक्सर हम इंसान अपने जीवन में बड़े या छोटे होने की बात करते हैं, और इंसान का बड़ा या छोटा होना अक्सर हम उसके "पैसे", "शोहरत", या "रुतबे", के हिसाब से तय करते हैं। लेकिन इंसान का बड़ा या छोटा होना ये सब चीज़ें तय नहीं करती हैं, "असल में, इंसान की "सोच" और उसके "कर्म" ही उसे "बड़ा" या "महान" बनाते हैं। हमें हमेशा अपनी "सोच बड़ी" और "अच्छी" ही रखनी चाहिए, क्योंकि अगर हम बड़ा सोचेंगे ही नहीं तो बड़ा काम कर कैसे पाएंगे ? अगर हम अपने "दिल" और "दिमाग" में "दरिद्रता", "गरीबी", को ही जगह दिए रहेंगे, तो हम कभी "धनी" नहीं बन सकते। और इसके उलट अगर हम "सकारात्मक सोच" के साथ "आशान्वित" रहेंगे कि एक दिन हम भी "धनी" होंगे, तो अवश्य ही हम धनी होंगे।
"असल में, इंसान की "कामयाबी, "नाकामयाबी, का सारा "दारोमदार", उसकी "सोच" और "नियत" पर निर्भर करता है। क्योंकि व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है, हम जैसा "बनना चाहते हैं, वैसा बार-बार सोचें तो एक दिन अवश्य हम वैसे ही बन जायेंगे। कामयाबी की "ऊँचाइयाँ" हमारी "सोच" से ही निकलती हैं। इंसान में सोच की ऐसी "जादुई ताक़त" है, कि अगर वह इस सोच का "उचित प्रयोग" करे, तो कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है। 
"इसलियें दोस्तों, हमें और आपको चाहिए कि हमेशा बड़ा सोचें, बड़ा सोचने से बड़ी उपलब्धियां, और कामयाबियां, हासिल होंगी, फायदे भी बड़े होंगे, और देखते ही देखते हम अपनी "बड़ी सोच" के द्वारा "बड़े आदमी" भी बन जायेंगे।
               (धन्यवाद)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"



मेहनत और आत्मविश्वास का जादू


'कहा जाता है कि इंसान के अन्दर "मेहनत" करने का गुण, और "ख़ुद पर यक़ीन" यानि "आत्मविश्वास", हो, तो एक ना एक दिन "जादू की तरह इसका "फल" मिलता है। हमें पता भी नहीं चलता, और हम "सफलता की "ऊँचाइयों को छूने लगते हैं।
"दरअसल, हम सब अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी का ऊँचे से ऊँचा "पहाड़" तो छूना चाहते हैं, हर पल एक "नया इतिहास" रचना चाहते हैं, हर क़दम पर "कुछ" कर गुज़रना चाहते हैं। लेकिन ये सब करने के लियें ना तो हम पूरे तौर पर मेहनत करते हैं, और ना ही हमें अपने ऊपर "यक़ीन" होता है कि हम यह सब कर पाएंगे, नतीजा ये होता है कि कामयाबी पाने के रास्ते पर चलते हुए जब "मुश्क़िल" या "विपरीत" "परिस्थितयां" आती हैं तब हम "पूरी शिद्दत" के साथ मेहनत नहीं कर पाते, और हमारा "आत्मविश्वास भी "डगमगाने" लगता है, और हम "परेशानियों की "धधकती आग" की "तपिश" से घबराकर "वापस" लौट जाते हैं।
"असल में, ज़िन्दगी में "कुछ" हासिल करने के लियें, मेहनत के "कड़े" और "लंबे रास्ते" से गुज़रना ही होता है, और साथ ही ख़ुद पर यक़ीन भी बनाये रखना होता है। हर "शिखर" पर हमेशा "खाली जगह" भी होती है, अगर इंसान मेहनती हो तो किसी भी "ऊँचाई" को पाने में सफलता हासिल की जा सकती है। दरसअल, मेहनत और आत्मविश्वास का चोली-दामन का साथ होता है, जब हम मेहनत करते हैं तो हमारे अन्दर आत्मविश्वास आता है, तब हम उस आत्मविश्वास के बल पर और ज़्यादा मेहनत करते हैं। मेहनत और आत्मविश्वास साथ-साथ चलते हैं, लेकिन अगर आत्मविश्वास में कमी आ जाये तो हम कठोर मेहनत के बाद भी "ऐन मौके पर" पर बाज़ी "हार" जाते हैं।
"तो दोस्तों, ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करने के लियें मेहनत, और आत्मविश्वास यानि ख़ुद पर भरोसा, दोनों ही चीज़ें बहुत "ज़रूरी" होती हैं, और अगर हम इन दोनों ही चीज़ों को कर पाये, तो "निःसन्देह" हमें "मेहनत" और "आत्मविश्वास" का "जादू" देखने को ज़रूर मिलेगा, और हम कामयाब हो जायेंगे।।
             (शुक्रिया) 
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लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

ज़िन्दगी का दूसरा नाम है आशा


"कहा जाता है कि जीवन का दूसरा नाम "आशा" यानि "उम्मीद" है, जहाँ "ज़िन्दगी" है वहाँ "आशा" है, और जहाँ आशा(उम्मीद) नहीं, वहाँ "जीवन" का कोई "मतलब" ही नहीं। "दरअसल, हमारे जीवन की मूल "बुनियाद" यही आशा(उम्मीद) है इसी के सहारे हम अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में "तीन चीज़ों" की "आशा" ज़रूर लगाये रखता है- 1.प्रियतम का सहचर्य (महबूब का साथ) 2. अतुल संपत्ति(बेशुमार दौलत) 3. अमरता(कभी ना मरना), चाहें ज़िन्दगी में हमें ये चीज़ें मिलें या ना मिलें, लेकिन ज़िन्दगी के "मायने" यही हैं कि इनकी और इनके जैसी अन्य चीजों की आशा या उम्मीद हमेशा हर इंसान रखता है। 
"असल में, उम्मीद की "अहमियत" कभी कम नहीं होती, और ख़ुद से उम्मीद रखना, और दूसरों की उम्मीदों पर "खरा" उतरना जीवन का "लक्ष्य" होना चाहिए। और अगर उम्मीदों से परे हटकर हम अपनी ज़िन्दगी "न्यूट्रल गियर" में गुज़ार रहे हैं, तो  यह तय है कि हम अपनी ज़िन्दगी "चलताऊ" तरीके से गुज़ार रहे हैं। दरअसल आशा पैदा होती है "विश्वास" से, जिस चीज़ का हमें विश्वास(भरोसा) होता है, उसकी हम "आशा" भी करते हैं। और "सच्चे मन" से कार्य करने पर वह चीज़ हमें मिल भी जाती है।
"तो दोस्तों, *जब तक सांस है तब तक आस है* इसलिए हमें आशा या उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, ज़िन्दगी के "कठिन रास्तों" पर "मुश्किलों" की वजह से "निराशाओं" से भी हमारा "सामना" होता है, लेकिन उनसे हारकर बैठना ठीक नहीं, बल्कि "सकारात्मक सोच" और आशा के साथ "सच्चे मन" और "लगन" से कार्य करने से जीवन में सारी उम्मीदें ना सही लेकिन कुछ उम्मीदें ज़रूर पूरी होंगी।।
        (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

जीवन एक रंगमंच है


"कहा जाता है कि हमारा जीवन एक "रंगमंच"(नाच, नाटक, खेल, करने की जगह) है। और हम सब इंसान इस "रंगमंच" पर "नाटक" करने वाले "कलाकार और "अभिनेता हैं। और इस रंगमंच को चलाने वाला, यानि इसका "डाइरेक्टर" वो ऊपर बैठा "हमारा ख़ुदा", "हमारा ईश्वर" है।
"दरअसल, हमारी ज़िन्दगी रंगमंच पर चलता हुआ एक "नाटक" ही तो है, हमें इस रंगमंच पर या इस दुनिया के नाटक में अभिनय(Acting) करने के लिये ही तो भेजा गया है। इसी अभिनय के तहत हम अपनी ज़िन्दगी में "रोते" भी हैं, "हँसते" भी हैं, "दुःखी" भी होते हैं, "खुश" भी होते हैं, "प्यार" भी करते हैं, "नफ़रत" भी करते हैं, किसी को "मारते" भी हैं, ख़ुद "मरते" भी हैं, "ख़लनायक" बनकर लोगों पर "ज़ुल्म" भी करते हैं, और "नायक" यानि "हीरो" बनकर लोगों की "मदद" भी करते हैं।। 
"असल में, "ख़ुदा ने हम सबको इस दुनिया के "रंगमंच" पर अपने "अभिनय" या Acting की बेहतर से बेहतर "Performence" देने के लिये भेजा है, और एक दिन आख़िर में जब इस जीवन के नाटक का "अंत" होगा तब हमारे अभिनय की Performence का "रिजल्ट" हमें पता चलेगा, कि हमें "जिस अभिनय" के लिये भेजा गया था वो हमने "कैसा" किया, क्योंकि उस ख़ुदा ने तो जीवन के इस रंगमंच पर भेजने के साथ-साथ इसमें अभिनय करने के लिये "स्क्रिप्ट"(क़ुरान, गीता, बाइबल, गुरुग्रंथ) भी "लिखकर" भेजी है। और इस "स्क्रिप्ट" में साफ़-साफ़ ये बता दिया है कि हमें ज़िन्दगी के इस रंगमंच पर "किस तरह अभिनय करना है, अब ये हमारे ऊपर है कि हम जीवन के इस रंगमंच के मंच पर ख़ुदा की भेजी हुई "स्क्रिप्ट" के "मुताबिक" अभिनय करते हैं या "अपनी मर्ज़ी" से "अलग-थलग" होकर अपने "डायलॉग" बोलते हैं। लेकिन कुछ भी करें एक दिन हमें अपने अभिनय की इस Performence का हिसाब अपने Director उस ख़ुदा को ज़रूर देना होगा, और हमारी Performence के हिसाब से ही वो हमें हमारा ईनाम देगा।। (बस दोस्तों इतना ज़रूर याद रखें)          (शुक्रिया)
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*लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद*
संस्थापक/अध्यक्ष 
"इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी"

ये है भारत की "गंगा-जमुनी" "तहज़ीब" और असली "इन्सानियत



"दोस्तों, "नफ़रतों" के "बादल" चाहें कितना भी "घुमड़-घुमड़" कर आयें, लेकिन जब "बरसते" हैं तो "इन्सानियत की बारिश" बनकर ही "बरसते" हैं।
जी हाँ, मामला कांठ थाना क्षेत्र के गाँव "अकबरपुर चंदेरी" का है इस गांव में एक "एसआई" ने भारत की "गंगा-जमुनी तहज़ीब" की बेहद "ख़ास" "मिसाल" पेश की है। दरअसल, इस गांव में एक मंदिर है, जहाँ शिवरात्रि के मद्देनज़र लोगों की भारी भीड़ पहुंचती है। इस मंदिर तक जाने वाले रास्ते का निर्माण कार्य चल रहा है अभी भी ये पूरी तरह बना नहीं है, और कई जगह से टूटा हुआ है।

शिवरात्रि के मद्देनजर गांव के लोग मंदिर जाएंगे और जलाभिषेक करेंगे, लेकिन मंदिर का रास्ता खराब होने से उन्हें परेशानी आएगी। मंदिर में आने वाले भक्तों को परेशानी ना हो इसलिए कांठ थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर "हारून ख़ान" ने ख़ुद ही "फावड़ा" उठाकर "मोर्चा" संभालते हुए रास्ते को सही करने की "कवायद" शुरू कर दी। सब इन्स्पेक्टर हारून ख़ान को फावड़ा चलाता देख आस-पास के लोग और दूसरे ग्रामीण हैरत में पड़ गए, उनके लिए पुलिस का यह "रूप" "चौंकाने" वाला था। सब- इन्स्पेक्टर को फावड़ा चलाते देख दूसरे लोग भी उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर सड़क सुधार के कार्य में हाथ बंटाने लगे। पूरे रास्ते के गड्ढों को मिट्टी डाल कर टेल्स लगा कर सही किया गया। ज्ञात हो कि ये वही गाँव है जहाँ लाउडस्पीकर को लेकर पूर्व में "विवाद" हो चुका है, और उसी विवाद को "कंट्रोल" करने में उस समय के मुरादाबाद जिलाधिकारी की आँख में "गंभीर चोट" आयी थी, और उन्हें चिकित्सा के लियें चेन्नई भेजना पड़ा था।

"दोस्तों, सब-इन्सपेक्टर "हारून ख़ान" का ये कार्य दोनों ही रूप में "सराहनीय" है, एक तो वे अपनी "डयूटी" के प्रति "बेहद गंभीर, और "सतर्क हैं, दूसरे वो एक "मुस्लिम" हैं, और इस तरह से "मन्दिर" के रास्ते को अपने हाथों से "श्रमदान" देकर उन्होंने "इन्सानियत" की जो "मिसाल" पेश की है। वो "प्रशंसा" के क़ाबिल है।

"और हमारी हमेशा यही "कोशिश" रहती है कि समाज में कहीं भी कोई भी "अच्छा", और "इन्सानियत को ज़िन्दा" रखने वाला "काम" कर रहा है तो उसको हम अपनी "लेखनी" के द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं, जिससे कि दूसरे भी उससे "प्रेरणा" ले सकें, और "इन्सानियत की मिसाल" क़ायम कर सकें। (धन्यवाद)

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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)

संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*



मुरादाबाद: एसआई हारुन खान ने पेश की मिसाल, मंदिर जाने वाले रास्ते को ठीक करने के लिए उठाया फावड़ा

http://dhunt.in/20gc6?ss=wsp

via Dailyhun

Wednesday, February 22, 2017

जीवन की "कठिनाइयाँ" और इंसान की "बौखलाहट



"कहा जाता है कि ज़िन्दगी में अक्सर हम इन्सानों के सामने जब कोई "कठिनाई" या "परेशानी" आती है, तो ऐसी स्थिति में हम "बौखला" जाते हैं, और बिना सोचे-समझे कोई "ग़लत फैसला" कर बैठते हैं, जिससे हमें बजाय "फायदे" के "नुकसान" ही होता है।
"दरअसल, यह बात सही है कि हमारे जीवन में "लाखों कठिनाइयाँ" हैं, मगर इन कठिनाइयों से निकलने के "रास्ते" और "उपाय" भी कम नहीं। लेकिन ज़िन्दगी में जब कोई कठिनाई हमारे सामने आती है तो हम बौखला जाते हैं, और यही "बौखलाहट" हमारी "सोचने-समझने" की "ताक़त" को कम कर देती है, और ऐसे में हम कोई गलत फैसला ले बैठते हैं। जबकि ऐसी किसी भी "परिस्थिति" में होना यह चाहिए कि हम अपने दिमाग को "शांत" रखने की कोशिश करें, कठिनाई से "घबरायें" या "भागें" नहीं, और उन हालात के आगे "लड़खड़ाने की बजाय, धैर्य, सुकून, और "सहजता के साथ उस कठिनाई से "बाहर" निकलने का "रास्ता" तलाश करें।
"असल में, कठिनाई जितनी भी बड़ी हो, उसके आगे "मौन साधना" सीखें, बिना "हड़बड़ाये शांत होकर दिल और दिमाग को ठंडा करने से ही "आधी लड़ाई" उस कठिनाई से हम जीत सकते हैं। क्योंकि अगर हमारा "मन" और "मस्तिष्क" "शांत" और "स्थिर" नहीं होता, तो किसी भी कठिनाई की स्थिति में समस्या बजाय कम होने के "बढ़ती" ही है। अगर हमें बुरे हालात से सामना करना है तो "भावनात्मक रूप" से मज़बूत रहना होगा, और शांत रहकर "बुरे हालात" से छुटकारा पाना होगा।
"तो दोस्तों, हम सभी की ज़िन्दगी में "परेशानियां, "कठिनाइयां, "समस्याएं, तो आती ही हैं, लेकिन ऐसी "परिस्थिति" में हमें और आपको चाहिए कि बिना "घबराये, बिना "बौखलाये, "शांत मन" से अपनी परेशानी की वजहों, और उससे बाहर निकलने का "रास्ता" तलाश करें, और यक़ीन रखें ऐसा करने से बड़ी से बड़ी कठिनाई भी आसान हो जाती है (धन्यवाद)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*

चेहरे की सुंदरता अच्छी, या मन की सुंदरता अच्छी



"कहा जाता है कि अगर हमारी "आँखें" चेहरे की जगह "आत्मा या मन की "सुंदरता" देख पातीं, तो ये दुनिया कुछ अलग होती। हमारे "रिश्ते" और "व्यवहार" सभी अलग होते, और सुंदरता की "परिभाषा(Definition) भी अलग होती।
"दरअसल, आज हमारे समाज में हर दिन "युवा लड़के" और ख़ास तौर पर "लड़कियाँ" सुंदरता के प्रति किये जाने वाले इस "भेदभाव" के शिकार होते हैं। अक्सर हम दूसरों के द्वारा अपने बहुत पतले, बहुत मोटे, दूसरों से लंबे, या बहुत ठिगने, या फिर काला या गोरा होने के "तानों" का शिकार होते हैं। दूसरों के द्वारा किये गये "तानाकशी" या Comments से कई तरह की "हीनभावनाएं" हमारे दिल में बैठ जाती हैं, जो हमारा पीछा नहीं छोड़तीं, और हम अपने आपको दूसरों से "तुच्छ" समझने लगते हैं, और ना चाहते हुए भी हम कई तरह के "दबाव" "झेलते" रहते हैं।
"असल में, हम समाज के द्वारा की गयी सुंदरता की परिभाषा को नहीं बदल सकते, लेकिन अपनी सोच, और अपने लियें सुंदरता की परिभाषा को अवश्य बदल सकते हैं। हम सुन्दर होने के लियें इसलियें बेचैन रहते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि हम सुन्दर नहीं हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं, हमें सोचना यह चाहिए कि ईश्वर का बनाया हुआ हर व्यक्ति सुन्दर होता है, हर कोई अपने अन्दर कोई ना कोई "ख़ूबसूरती" लिए हुए होता है। किसी का "चेहरा सुन्दर होता है, किसी की "आवाज़ सुन्दर होती है, किसी का "व्यवहार सुन्दर होता है, किसी की "आँखें सुन्दर होती हैं, किसी के "बाल सुन्दर होते हैं, किसी की "नाक सुन्दर होती है, और कोई "गोरा होकर भी सुन्दर नहीं होता, तो कोई "काला" होकर भी बेहद "सुन्दर और "आकर्षित" लगता है।
"दरअसल, सुंदरता ईश्वर ने नहीं समाज ने तय की है, हमारे जीवन के लियें हमारा ये शरीर एक "सच" है, और हम इसे सबसे सुंदर मानकर प्यार करें, चेहरे के साथ-साथ विचारों की सुंदरता भी बेहद अहम् है, लोग चेहरे से "आकर्षित" तो होते हैं, लेकिन "प्यार" आपके "व्यवहार और "गुणों से करते हैं, इसलियें अपने चेहरे या शरीर के लिये ख़ुद को "कोसना" बंद करें, आप कैसे दिखते हैं, इसकी जगह आप क्या हैं, कहाँ "मज़बूत" हैं, और कौन सी "ख़ूबी" आपके अंदर है, इस रूप में ख़ुद की सुंदरता को परिभाषित करें।।
"तो दोस्तों, हमें और आपको चाहिये,(ख़ास तौर पर युवा लड़कियों को) कि अपने चेहरे, अपने शरीर, या अपने रंग को लेकर किसी भी तरह की हीन-भावना का शिकार ना हों, आप जैसे भी हैं बेहद सुन्दर हैं, और अपने अंदर मोटे, पतले, लंबे, ठिगने, या काला, या गोरा, होने का "ऐब" निकालने की बजाय, अपने "व्यवहार और "गुणों" को दूसरों के सामने लायें, और अपनी "आत्मा" और "मन" की "सुंदरता से सबका मन मोह लें।
(धन्यवाद)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
*इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी*

Thursday, February 16, 2017

वक़्त से शिक़ायत



"आज के दौर में अक़्सर लोग "वक़्त" की "बुराई" करते मिल जाते हैं, अक्सर इंसान ये सोचता हैं कि "वक़्त" का उससे जैसे "छत्तीस का आंकड़ा" है, "बहुत बुरा समय है" को "तकिया कलाम" बनाकर, उसे दोहराते रहना आज के इंसान की "आदत बन चुकी है। और ये एक ऐसी आदत है जो ज़िन्दगी के "मज़े" हमसे "छीनती" है। 
"दरअसल, वर्तमान(Present time) को लेकर नकारात्मक सोच(Negative thinking) हर दौर की "सच्चाई" रही है। जितनी "परेशानियां, जितना "भ्रष्टाचार, जितना "अनादर, जितना "दुराचार, जितना "असत्य और "झूठ, आज के दौर में है, उतना ही कमोबेश पहले के ज़माने में भी था, ये अलग बात है कि उसके प्रकार (Category) अलग थी। और जितनी "ईमानदारी, जितनी "सत्यता, जितनी "मानवता, और "नेक-नियती, पहले थी, कमोबेश आज भी उतनी ही है, ये अलग बात है कि ये सब "अच्छाइयाँ" लोगों तक कम पहुँचती हैं, बल्कि "बुराइयाँ" ही ज़्यादा पहुँचती है।
"असल में, पहले का ज़माना हो या आज का दौर, मौजूदा वक़्त की एक राह, "बर्बादी" की ओर जाती है, और एक राह "नवनिर्माण" यानि "तरक़्क़ी" की ओर जाती है। हमारी जो "शिकायतें" वक़्त से होती हैं, उन्हें दूर करने के लिये ख़ुद ही आगे आना चाहिए, माँ के पेट से बाहर आते समय हमारी "बंद मुट्ठी" में जो कुछ होता है, उसे अपने "बूते" से हम जितना "विकसित" कर सकते हैं या बढ़ा सकते हैं उसी से हमारा वक़्त और ये दुनिया "खूबसूरत" होती है। हमें अपना वक़्त सुधारने, और अच्छा करने के लियें, आंतरिक तौर(अन्दर से) "जागना" होगा, क्योंकि किसी अन्डे का खोल अगर बाहरी "प्रहार(चोट) से टूटता है, तो "जीवन का अंत" हो जाता है, और उसी अन्डे का खोल अगर अपने-आप आंतरिक शक्ति(अंदर की ताक़त) से "टूटता" है तो एक जीवन की "शुरुआत" होती है। इसी तरह वक़्त को लेकर हमारी "शिकायतें" दूर करने की "ताक़त" भी हमारे अन्दर ही है।
"इसलियें दोस्तों, हमें और आपको चाहिए कि "वक़्त बुरा चल रहा है" का जुमला कह-कहकर हाथ पर हाथ धरे ही ना बैठे रहें, बल्कि अपने अन्दर की "ताक़त" के बल पर बुरे वक़्त की "वजहों" को तलाश करने की कोशिश करें, और वक़्त की "बुराइयों" को "अच्छाइयों" में बदलने की कोशिश करते रहें, और इंशाअल्लाह एक ना एक दिन वक़्त अच्छा ज़रूर होगा।
              (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)
संस्थापक/अध्यक्ष
इन्सानियत वेलफेयर सोसाइटी