Sunday, November 20, 2016

डर से मरें नहीं, डर को मारें

"कहा जाता है कि "डर" एक ऐसी चीज़ है जो "इंसान" को जीते-जी "मार "देता है, और यही डर इंसान को धीरे-धीरे "मौत" की तरफ धकेल देता है।
"दरअसल, ये बात बिलकुल सच है कि इंसान की ज़िन्दगी में डर अगर उसके ऊपर "हावी" हो जाये तो इंसान "जीते-जी" मर जाता है, और डर के "कारण" ही एक दिन वह मौत के "आगोश" में समा जाता है। डर किसी भी प्रकार का हो, "बीमारी का डर, "नाकामी का डर, "असफलता का डर, "बदनामी का डर, या "मौत का डर", डर हमेशा हमारी ज़िन्दगी "ख़त्म" करने को "आतुर" रहता है, और धीरे-धीरे ख़त्म कर भी देता है।
"असल में, डर क्या है ? डर वह है जब हम किसी "कठिन परिस्थिति" या "स्थिति" का "सामना" नहीं करना चाहते, या लंबे समय तक किसी "अनचाहे काम" या बात को "टालना" चाहते हैं, और यही लंबा समय एक "अनचाहे डर" में बदल जाता है। और यही डर कई बार "बेहद घातक" रूप ले लेता है। और इसी की वजह से लोग अपनी ज़िन्दगियाँ भी "ख़त्म" कर लेते हैं। "बीमार इंसान" "मौत" के डर से, मौत आने से पहले ही मर जाता है। असफल इंसान "नाकामयाबी" के डर से जीते-जी मर जाता है। कई लोग "बदनामी के डर" से अपनी ज़िन्दगियाँ "ख़त्म" कर लेते हैं, दरअसल हमें ज़रूरत इस बात की है कि जिस डर से "डरकर" हम अपनी ज़िन्दगी "तिल-तिल" करके "ख़त्म" कर रहे हैं, उसी डर को क्यों ना हम "ख़त्म" कर दें, बजाय डर से डरकर "मरने" के, डर को ही क्यों ना "मार" दें। इसके लिये हमें करना यह होगा कि जिस काम से हमें डर लग रहा है उसे ही सबसे पहले करें, डर अपने आप मर जायेगा। जिस काम से हम डरते हैं, उसी काम को यदि हम बार-बार करें, और तैयारी के साथ करें, तो हमारे डर की मौत तय है।
"तो मेरे दोस्तों, हमारी ज़िन्दगी में चाहे-अनचाहे डर हर किसी को लगता है, और कभी-कभी हम इस डर से इतना ज्यादा डर जाते हैं कि अपनी ज़िन्दगियाँ भी ख़त्म कर लेते हैं, मगर हमें और आपको ज़रूरत इस बात की है कि इस "डर रुपी राक्षस" से डरें नहीं, बल्कि इससे आँख मिलाकर इसे ही डराएं, और डर से मरने की बजाय, डर को ही मारने की कोशिश करें।।
            (शुक्रिया)
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(लेखक - राशिद सैफ़ी "आप" मुरादाबाद)

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