Sunday, November 20, 2016

कल्पना(तसब्बुर) का संसार

"कहा जाता है कि "कल्पना(तसब्बुर)" करने की "ताक़त" इंसान को ईश्वर से मिला एक "अनोखा वरदान" है। और यह "कल्पना" यानि "तसब्बुर" अगर ना होता तो शायद इंसान आज इतनी "तरक़्क़ी" ना कर पाता।
"दरअसल, वह कल्पना ही है, जिसने इंसान को बाकी "जीवों" से "अलग पहचान" दी है। दुनिया में ऐसा और कोई जीव नहीं, जो "समुन्द्र की गहराई" से लेकर "पहाड़ की ऊँचाई" तक का "सफर" करता है, और यह सब "कल्पना की शक्ति" के बल पर ही होता है, मनुष्य अगर कल्पना ना करता तो आज दुनिया में इतने बड़े-बड़े "आविष्कार" ना होते, आज हमारे "रहन-सहन" और "ऐशो-आराम" की सभी चीज़ें कल्पना शक्ति के सहारे ही "संभव" हुई है, इन सारी चीजों की पहले "कल्पना" ही की गयी, उसके बाद ही इन सब चीजों को "साकार" किया गया।
"असल में, मनुष्य के लिये कल्पना करना, यानि तसब्बुर करना भी बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इंसान अगर "नयी चीज़ों" के बारे में सोचेगा नहीं, उनकी कल्पना नहीं करेगा तो, कुछ भी "नया काम" हो ही नहीं पायेगा, कोई भी "नया आविष्कार" बिना कल्पना के संभव ही नहीं है, बल्कि "कल्पना" ही "आविष्कार" की "जननी" है।
"दोस्तों ये बात तो सच है कि कल्पना करना इंसान के लिये उतना ही "ज़रूरी" है जितना "यथार्थ" यानि "हक़ीक़त" में जीना, लेकिन हमें और आपको चाहिए कि अपनी ज़िन्दगी में किसी भी "नए काम", या "अच्छे काम", की "कल्पना" यानि "तसब्बुर" तो करें, लेकिन हर समय सिर्फ "कल्पनाओं" में ही ना "खोये" रहें, हर वक़्त सिर्फ "ख़्यालों" में ही "गुम" ना रहें, बल्कि अपनी "कल्पनाओं" को "हक़ीक़त" में बदलने के लिये "सच्चे दिल", और "सकारात्मक सोच" के साथ "कोशिश" भी करें, तभी हम अपनी ज़िन्दगी में "कामयाब" हो पायेंगे, और समाज में दूसरे लोगों के लियें भी एक "मिसाल" "क़ायम" कर पायेंगे।।
              (धन्यवाद)
••••••••••••••••••••••••••••••••
(लेखक - राशिद सैफी "आप" मुरादाबाद)

0 comments:

Post a Comment